PM मोदी का नया 'मास्टर प्लान'? नीतीश कुमार को लेकर सियासी अटकलें
पटना। बिहार की सियासत में एक बार फिर पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ गए हैं। सियासी गलियारों में यह चर्चा पुरजोर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संभावित कैबिनेट विस्तार में नीतीश कुमार का नाम मंत्रियों की सूची में सबसे आगे चल रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल करने के पीछे भाजपा उत्तर प्रदेश के कुर्मी वोट बैंक को साधने की रणनीति बना रही है। हालांकि, इसके समानांतर एक दूसरी थ्योरी यह भी चल रही है कि इस कदम के जरिए नीतीश कुमार को बिहार की सक्रिय राजनीति से दूर करने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि राज्य की सत्ता पर उनकी पकड़ को शिथिल किया जा सके।
मुख्यमंत्री पद का त्याग और केंद्रीय मंत्री के रूप में कद का आकलन
बिहार के राजनीतिक हलकों में यह यक्ष प्रश्न तैर रहा है कि यदि नीतीश कुमार केंद्र में मंत्री पद की भारी-भरकम जिम्मेदारी संभालने में सक्षम हैं, तो उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री का पद क्यों छोड़ा। विदित हो कि कुछ समय पहले उनके स्वास्थ्य, सार्वजनिक भाषणों और कार्यक्रमों के दौरान उनके आचरण को लेकर कई तरह के सवाल उठे थे, जिसके बाद राज्य में सत्ता परिवर्तन हुआ और सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली। राजनीतिक विश्लेषकों का तर्क है कि जब भी नीतीश कुमार के भविष्य के राजनीतिक पुनर्वास की बात होती थी, तो उनके कद के अनुरूप उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति या एनडीए संयोजक जैसे बड़े पदों की चर्चा की जाती थी। ऐसे में उन्हें महज एक केंद्रीय मंत्री बनाना उनके लंबे राजनीतिक योगदान का प्रमोशन तो कतई नहीं कहा जा सकता।
दिल्ली का स्थायी ठिकाना और बिहार यात्रा पर संशय के बादल
चर्चाओं के अनुसार, यदि नीतीश कुमार केंद्रीय मंत्री बनते हैं तो उनका कार्यक्षेत्र संपूर्ण भारत हो जाएगा और परिणाम-आधारित कार्यशैली के कारण उन्हें देश के अन्य राज्यों को भी पर्याप्त समय देना होगा। ऐसी स्थिति में केवल बिहार उनकी इकलौती प्राथमिकता नहीं रह जाएगा। सबसे बड़ा संकट उनके उस वादे पर मंडरा रहा है जो उन्होंने मुख्यमंत्री पद छोड़ते समय अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं और सूबे की जनता से किया था। जदयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने घोषणा की थी कि वे जल्द ही जमीनी हकीकत जानने के लिए बिहार की यात्रा पर निकलेंगे। परंतु, केंद्र की राजनीति में सक्रिय होने के बाद उनके इस जनसंवाद और विकास कार्यों की व्यक्तिगत मॉनिटरिंग वाली योजना पर पूरी तरह ग्रहण लग सकता है।
सक्रिय राजनीति से दूर रखने और सांगठनिक पिंजरे की कूटनीति
राजनैतिक विश्लेषकों का एक धड़ा इस पूरे घटनाक्रम को नीतीश कुमार के खिलाफ एक सोची-समझी सांगठनिक रणनीति के तौर पर देख रहा है। विश्लेषकों के अनुसार, जदयू और उसके सहयोगी दल के भीतर ही एक ऐसा गुट सक्रिय है जो नीतीश कुमार को बिहार की मुख्य राजनीति से बेदखल कर दिल्ली स्थानांतरित करना चाहता है, ताकि राज्य में भाजपा को अपने पैर पसारने का खुला मैदान मिल सके। ठीक ऐसा ही कुछ निशांत कुमार के साथ भी देखने को मिला था, जिन्हें पार्टी संगठन को मजबूत करने की बड़ी जिम्मेदारी देने के बजाय स्वास्थ्य मंत्रालय के विभागीय कार्यों में उलझा दिया गया। जानकार मानते हैं कि नीतीश कुमार को दिल्ली की जिम्मेदारी सौंपना और निशांत कुमार को विभाग में व्यस्त रखना, दरअसल डूबती हुई पार्टी को बचाने की कवायद नहीं बल्कि दोनों कद्दावर नेताओं को 'मंत्री पद' के पिंजरे में कैद कर बिहार की सियासत से दूर रखने की एक सोची-समझी बिसात है।

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