Cage Culture Fish Farming Betul: बैतूल (राष्ट्रीय जनादेश)। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) द्वारा महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त करने एक नई पहल की जा रही है। इसके तहत एनआरएलएम द्वारा जिले में पहली बार केज कल्चर से मछली पालन करवाया जाएगा। इसमें पानी में तैरते पिंजरों में मछली पालन किया जाता है। इसके लिए जिले के 2 जलाशयों को चुना गया है। इस प्रोजेक्ट के लिए 58 लाख रुपये की राशि की दरकार है, जिसकी व्यवस्था की जा रही है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत यह प्रोजेक्ट बनाया गया है। 

जिले में अभी तक पारंपरिक रूप से ही मत्स्य पालन किया जाता है। इसमें तालाबों या डैमों में बीज डाल दिए जाते हैं और फिर मछलियों को जाल की मदद से पकड़ लिया जाता है। अब एनआरएलएम द्वारा मछली पालन के क्षेत्र में एक नया प्रयोग किया जा रहा है। इसे केज कल्चर फिशरीज या पिंजरा आधारित मछली पालन कहा जाता है। इसमें 6 बाय 4 फीट के पिंजरे पानी में डाले जाते हैं। इन पिंजरों में ही मछली के बीज और भोजन भी होता है। इसी में बच्चे पैदा होते हैं और बढ़ते हैं। पानी में मौजूद अन्य मछलियों की प्रजाति के संपर्क में वे नहीं आते। जिससे जिस नस्ल के बीज डाले जाते हैं, उन्हीं का उत्पादन प्राप्त होता है। पारंपरिक मछली पालन के मुकाबले इसमें उत्पादन भी अधिक होता है। इसके लिए ऐसी जल संरचनाओं की जरुरत होती है जिनमें 40 से 50 फीट गहराई तक पानी हो। 

शुरूआत में इतना आएगा खर्च 

केज कल्चर के लिए सारणी स्थित सतपुड़ा डैम और बैतूल में स्थित सांपना डैम को चुना गया है। दोनों डैमों में 18-18 पिंजरे डाले जाएंगे। इन पिंजरों और मछलियों के भोजन आदि की व्यवस्था के लिए 29-29 लाख, कुल 58 लाख रुपये का खर्च आएगा। इस राशि की व्यवस्था के लिए सीएसआर (कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसबिलिटी) दिल्ली और डीएमएफ (डिस्ट्रिक्ट माइनिंग फंड) बैतूल को प्रस्ताव भेजे गए हैं। राशि स्वीकृत होते ही इस प्रोजेक्ट पर काम चालू हो जाएगा। 

इतना उत्पादन होने का अनुमान 

इस पद्धति से मछली पालन करने पर एक केज से पहले ही साल 2 टन मछली उत्पादन होगा। आने वाले वर्षों में यह उत्पादन ढाई टन तक पहुंच सकेगा। इस तरह पहले साल में 18 केजों से 9 लाख और दूसरे साल से 15 से 16 लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ हो सकेगा। इस पद्धति के तहत पंगेशियस मछली का उत्पादन किया जाएगा। इसके बीज भी तैयार किए जा रहे हैं। इस मछली की खासी डिमांड रहती है। 

स्व सहायता समूहों को सौंपेंगे कार्य 

दोनों ही डैमों पर अलग-अलग महिला स्व सहायता समूहों को इस कार्य का जिम्मा सौंपा जाएगा। समूह यह कार्य पूरी जिम्मेदारी से करें, इसके लिए इस प्रोजेक्ट पर आने वाली कुल लागत की 20 प्रतिशत राशि उनसे भी जमा कराई जाएगी। इस प्रोजेक्ट के जरिए जिले में भी वैज्ञानिक रूप से जलीय कृषि की शुरूआत हो सकेगी और मत्स्य पालन आधारित आजीविका मजबूत की जा सकेगी। खास बात यह है कि इस तकनीक से मछली पालन में किसी अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता नहीं होगी। अभी इस पद्धति से मछली पालन के मामले में झारखंड राज्य काफी चर्चित है।