Betul District Hospital Cleanliness: जिला अस्पताल खुद बीमार! गंदगी, मच्छरों और कबाड़ के बीच इलाज को मजबूर मरीज
Betul District Hospital Cleanliness: बैतूल (राष्ट्रीय जनादेश)। किसी भी अस्पताल आने वाले मरीजों को बेहतर उपचार के साथ ही अस्पताल के अंदर-बाहर स्वच्छ एवं साफ सुथरा वातावरण होना आवश्यक है। इन सबसे ही मरीज को बीमारी से राहत मिलती है, लेकिन जिला मुख्यालय स्थित जिला असपताल के अंदर और बाहर का माहौल देखे तो एक झलक में ही नजर आ जाता है कि जिला अस्पताल को ही पहले उपचार की जरूरत है। तीन मंजिला अस्पताल भवन के अंदर तो थोड़ी साफ-सफाई नजर आती है, लेकिन अस्पताल भवन के आसपास गंदगी का साम्राज्य है। अस्पताल भवन के बीच-बीच में ताजी हवा आने के लिए लगभग 10-10 फीट की गली छोड़ी गई है, लेकिन लगता है इन गलियों को गंदगी फैलाने के लिए ही छोड़ा गया है। एक साइड जिला अस्पताल से निकला कबाड़ जमा किया गया है तो वहीं दूसरी साइड गटर का पानी बह रहा है। हालत यह है कि इन खुले स्थानों में मधुमक्खी के छत्ते लटक रहे हैं, वहीं कबूतरों का स्थाई डेरा बन गया है। दीवारों में पीपल के पेड़ तक उग आए हैं, लेकिन देखने वाला कोई नहीं है। यही हाल अस्पताल के सामने का भी है। गटर के पानी में मच्छरों की फौज पल रही है जो सामान्य इंसान को भी मरीज बनाने के लिए पर्याप्त है।
स्वास्थ्य महकमे का पूरा ध्यान करोड़ों रुपए के नए भवन बनाने पर रहता है। एक भवन बनकर तैयार होते ही दूसरे भवन की योजना शुरू हो जाती है। फिर भले ही इन भवनों का उपयोग हो या ना हो, उपयोग हो भी हो तो पर्याप्त मेंटेनेंस हो रहा है या नहीं, यह देखने की फुर्सत किसी के पास नहीं है। इसका उदाहरण जिला अस्पताल में आसानी से देखने को मिल जाएगा। यहां डॉक्टरों, पैरामेडिकल स्टॉफ, स्वास्थ्य कर्मचारियों की संख्या बढ़ाए बिना चार बिल्डिंग बना दी गई है। सीमित डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टॉफ से इनके संचालन में परेशानी हो रही वहीं मेंटेनेंस और देखरेख के अभाव में परिसर की साफ-सफाई तक नहीं हो पा रही है। जिसका नजारा जिला अस्पताल परिसर में साफ नजर आ रहा है।
मुख्य गेट के आस-पास ही बह रहा गटर का पानी
जिला अस्पताल के मुख्य गेट के एक साइड लोहे की बाउंड्री कर गार्डन बनाया गया है, लेकिन इस गार्डन में गटर के पानी के चैंबर खुले हुए हैं, जहां गटर का पानी जमा है। यहीं हाल दूसरे साइड का भी है यहां भी चैंबर से गटर का पानी बह रहा है, जिससे मच्छरों की फौज पनप रही है। मरीज के परिजन इसी गार्डन के सामने बनी बैंच पर बैठ कर मच्छर उड़ाते रहते हैं। अस्पताल में दर्जनों सफाईकर्मी हैं, लेकिन कभी भी चैंबर बंद करने और गटर के पानी निकलने पर रोक लगाने का प्रयास नहीं किया गया।
टूटे यूरीन पाट का उपयोग मजबूरी
जिला अस्पताल की ओपीडी में दोनों साइड वॉशरूम और टायलेट बने हैं, लेकिन चैनल गेट के पास वाला वॉशरूप परमानेंट बंद कर दिया गया है। दूसरी साइड एक मात्र वॉशरूम है जहां यूरीन पॉट टूटे हुए हैं। वहीं टायलेट गंदगी से बजबजाती है। ओपीडी आने वाले मरीजों और उनके परिजनों को इन्हीं टूटे हुए यूरिनल का उपयोग करना मजबूरी है। साफ-सफाई का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि डॉक्टर रूम में बदबू आने के कारण चैनल गेट साइड का वॉशरूम परमानेंट बंद कर दिया गया है।
कबाड़े से भरी एक साइड की गली
अस्पताल भवन में बीच में १०-१० फीट की दो गली छोड़ी गई है ताकि सभी वार्डों के कमरों में ताजी हवा और प्रकाश आ सके। सबसे सामने वाली गली में जिला अस्पताल का कबाड़ा भरा है। यहां टूटे पलंग, व्हील चेयर, नर्स ट्रे, स्ट्रेचर सहित अन्य टूटे हुए सामान भरे हैं। जिससे यहां भी नीचे गंदगी पनप रही है।
दीवारों में उग रहे पौधे
हवा और प्रकाश के लिए बनी गलियों में लगता है आज तक सफाई ही नहीं हुई। जिससे यहां दीवारों पर पीपल के पौधे उग आए हैं। इतना ही नहीं सफाई नहीं होने से मधुमक्खियों के छत्ते बन गए हैं, वहीं कबूतरों ने इसे स्थाई आवास बना लिया है। नीचे गटर का गंदा पानी बहता है। खिड़की खोलते ही मच्छरों की फौज आती है वहीं मधुमक्खियों के आने का भी खतरा रहता है। खिड़की और कांच पान-गुटके की पीक से लाल हो गए हैं। जिसे साफ करने वाला कोई नहीं है।
जिला अस्पताल के अंदर सहित आसपास का वातावरण ठीक रहे पर्याप्त साफ-सफाई रहे तो मरीज जल्दी स्वस्थ्य हो जाता है, लेकिन जिला अस्पताल परिसर में साफ-सफाई की स्थिति यह है कि स्वस्थ इंसान भी कुछ समय परिसर में बिताएं तो उसके बीमार होने का खतरा बढ़ जाता है। अस्पताल प्रबंधन यदि इस ओर ध्यान देकर अस्पताल परिसर में अंदर बाहर साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दें तो काफी हद तक व्यवस्था सुधर सकती है।

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