Betul Road Corruption: नगर पालिका परिषद बैतूल का पूरा ध्यान आज से नहीं, हमेशा से सिर्फ निर्माण कार्यों पर रहा है। क्वालिटी कंट्रोल से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं रहता है। नगर में होने वाले विकास कार्यों का शायद ही कभी कोई संबंधित इंजीनियर मौका मुआयना करता होगा। वजह साफ है- फील गुड फैक्टर। जिसका खामियाजा नगर की बेकसूर जनता को भुगतना होता है। इस बार भी नवागत कलेक्टर डॉ. संजय सौरभ सोनवणे के सामने बड़े-बड़े प्रोजेक्टों की गूगली फेंकी गई है। बुधवार को भी कलेक्टर के साथ सीएमओ और नपा के अमले ने शहर के प्रमुख चौराहों का निरीक्षण कर सौंदर्यीकरण और चौड़ीकरण की संभावनाओं पर चर्चा की।

आम जनता नगर पालिका बैतूल की अखबारों में और सोशल मीडिया में चल रही वीरगाथाओं से उब गई है। जनता पूछना चाहती है कि हम बैतूल में इस विकास को पागल होते कब तक देखते रहेंगे। नगर पालिका चुनाव को लगभग एक साल का समय बचा है। 2027 की शुरूआत के साथ नगरीय निकाय चुनावों की गहमागहमी शुरू हो जाएगी। लेकिन, भ्रष्टाचार और मिलीभगत के चलते शहर की सड़कों में हो रहे बड़े-बड़े गड्ढों का जवाब कौन देगा? हालात यह हो जाते हैं कि बारिश के मौसम में गड्ढों में सड़क ढूंढनी पड़ती है।

राजनैतिक तौर पर हाईप्रोफाइल श्रेणी में आ गए इस जिले के मुख्यालय की नगर पालिका परिषद द्वारा कराए जा रहे विकास कार्यों की गुणवत्ता की कोई मॉनिटरिंग नहीं है। कारण भी साफ है जो सभी को पता है कि आधे से ज्यादा निर्माण कार्यों की ठेकेदारी कथित तौर पर सत्तारूढ़ दल के पदाधिकारी और पार्षदों के दाएं-बाएं रहने वाले कर रहे हैं। इसी का परिणाम है कि शहर की हालत बद से बदतर स्थिति में पहुंच जाती है। फिर इस पर थूक पॉलिश करने की कवायद होती है, उसमें भी लाखों के बिल बनते हैं और काम शायद हजारों का भी नहीं होता है।

कलेक्टर सौरभ संजय सोनवणे से अपेक्षा है कि वे शहर के सौंदर्यीकरण के लिए नगर पालिका द्वारा बनाए गए प्रोजेक्टों पर तो सकारात्मक रूख रखें, लेकिन एक बार नगर पालिका के अमले से यह प्रश्र भी करें कि नगर में बनने वाली सड़कें 6 महीने भी क्यों नहीं टिक पाती है। इस खबर के साथ सैंपल के तौर पर नगर पालिका अध्यक्ष पार्वतीबाई बारस्कर के चंद्रशेखर वार्ड की दो सड़कों की तस्वीर प्रकाशित की जा रही है। जिससे शहर के बाकी क्षेत्रों के हालात आसानी से समझे जा सकते हैं।