ब्रेन ट्यूमर का बढ़ता जोखिम! महिलाओं की इस गलती पर विशेषज्ञों की चेतावनी
चिकित्सा विज्ञान में 'ब्रेन ट्यूमर' का नाम आते ही आम जनता के मन में कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का खौफ पैदा हो जाता है। हालांकि, कई न्यूरोलॉजिकल अध्ययनों से यह स्पष्ट हो चुका है कि हर ट्यूमर कैंसरयुक्त (Malignant) नहीं होता, लेकिन बिना कैंसर वाला ट्यूमर भी मानव मस्तिष्क के लिए बेहद गंभीर और जटिल समस्याएं खड़ी कर सकता है। भारत में हालिया दशकों में ब्रेन ट्यूमर का ग्राफ तेजी से बढ़ा है, जहाँ हर साल इसके लगभग 40,000 नए मामले दर्ज किए जाते हैं और करीब 25,000 लोगों की इससे मृत्यु हो जाती है। आनुवंशिक कारणों, तनाव, अनिद्रा और पर्यावरण प्रदूषण के बीच अब वैज्ञानिकों ने महिलाओं की एक बेहद आम व्यावहारिक आदत को लेकर एक बड़ा वैश्विक अलर्ट जारी किया है। नवीनतम रिसर्च के अनुसार, लंबे समय तक गर्भनिरोधक गोलियों (Contraceptive Pills), हार्मोनल इंजेक्शन या कॉन्ट्रासेप्टिव उपकरणों का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं में ब्रेन ट्यूमर विकसित होने का खतरा सामान्य महिलाओं की तुलना में काफी अधिक पाया गया है।
30 लाख महिलाओं के 25 वर्षों के मेडिकल रिकॉर्ड का विश्लेषण, 'मेनिन्जियोमा' ट्यूमर का मिला सीधा लिंक
कोपेनहेगन स्थित डेनिश मेडिसिन्स एजेंसी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक ऐतिहासिक अध्ययन में कुछ ऐसे चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं, जिसने दुनिया भर के हेल्थ एक्सपर्ट्स और स्त्री रोग विशेषज्ञों को चिंता में डाल दिया है। वैज्ञानिकों ने इस संबंध को गहराई से समझने के लिए 25 वर्षों तक लगभग 30 लाख महिलाओं के स्वास्थ्य रिकॉर्ड का गहन वैज्ञानिक विश्लेषण किया।
इस दीर्घकालिक रिसर्च में पाया गया कि जो महिलाएं अनचाहे गर्भ से बचने के लिए बिना डॉक्टरी परामर्श के लंबे समय तक हार्मोन-आधारित दवाओं और विशेष इंजेक्शनों का उपयोग करती हैं, उनमें 'मेनिन्जियोमा' (Meningioma) नामक ब्रेन ट्यूमर होने की आशंका अत्यधिक बढ़ जाती है। मेनिन्जियोमा ऐसा ट्यूमर है जो सीधे मस्तिष्क की कोशिकाओं में नहीं, बल्कि दिमाग और रीढ़ की हड्डी को सुरक्षा देने वाली झिल्ली (मेनिंजेस) में पनपता है। इसके बढ़ने से मस्तिष्क पर दबाव पड़ता है, जिससे लगातार तेज सिरदर्द, अचानक मिर्गी जैसे दौरे आना और आंखों की रोशनी धुंधली होना जैसे गंभीर लक्षण पैदा होते हैं।
कॉन्ट्रैसेप्टिव इंजेक्शन से 355 प्रतिशत तक बढ़ा खतरा, बढ़ती उम्र के साथ बढ़ता है जोखिम का ग्राफ
'जामा नेटवर्क जर्नल' (JAMA Network Journal) में प्रकाशित इस विस्तृत शोध रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने 1,473 मेनिन्जियोमा पीड़ित महिलाओं की तुलना 14,717 स्वस्थ महिलाओं के नियंत्रण समूह से की। इस तुलनात्मक अध्ययन में सबसे घातक परिणाम 'मेड्रॉक्सीप्रोजेस्टेरोन' (Medroxyprogesterone) नामक गर्भनिरोधक इंजेक्शन से जुड़े पाए गए, जो वैश्विक स्तर पर 'डेपो-प्रोवेरा' के नाम से बेहद प्रचलित है।
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जोखिम में भारी वृद्धि: इस विशिष्ट हार्मोनल इंजेक्शन का नियमित इस्तेमाल करने वाली महिलाओं में मेनिन्जियोमा ट्यूमर होने का खतरा 355% तक ज्यादा देखा गया।
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उम्र का प्रभाव: शोधकर्ताओं ने पाया कि यह खतरा उम्र बढ़ने के साथ अधिक सक्रिय होता है। 55 से 59 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं में, जो एक वर्ष से अधिक समय से इस इंजेक्शन का उपयोग कर रही थीं, प्रति 5,372 महिलाओं पर एक अतिरिक्त ट्यूमर का मामला सामने आया। इसके विपरीत, 15 से 19 वर्ष की युवा युवतियों में यह आनुपातिक जोखिम काफी कम दर्ज किया गया।
हार्मोनल कॉम्बिनेशन पिल्स भी दायरे में, इन विशिष्ट दवाओं को पाया गया सबसे संवेदनशील
अध्ययन के अनुसार, केवल इंजेक्शन ही नहीं बल्कि कॉम्बिनेशन गर्भनिरोधक गोलियां (जिनमें एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टोजेन दोनों हार्मोन्स मिश्रित होते हैं) भी मस्तिष्क की झिल्ली को प्रभावित करती हैं। विभिन्न दवाओं के रासायनिक तत्वों के आधार पर जोखिम का प्रतिशत इस प्रकार आंका गया है:
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डेसोजेस्ट्रेल (Desogestrel) युक्त दवाएं: ट्यूमर के खतरे को 66% तक बढ़ा देती हैं।
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साइप्रोटेरोन (Cyproterone) युक्त दवाएं: जोखिम में 61% की वृद्धि करती हैं।
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ड्रोस्पाइरेनोन (Drospirenone) युक्त दवाएं: 58% अधिक खतरा पैदा करती हैं।
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जेस्टोडीन और लेवोनॉरजेस्ट्रेल: क्रमशः 44% और 40% तक जोखिम बढ़ाती हैं।
राहत की बात: दवा बंद करने के 5 साल के भीतर सामान्य हो जाता है शरीर, विशेषज्ञों ने दी सलाह
इस संवेदनशील रिपोर्ट के बीच वैश्विक कैंसर विशेषज्ञों ने महिलाओं को पैनिक न होने की सलाह दी है। अमेरिकी कैंसर विशेषज्ञ डॉ. पॉल फरो के अनुसार, इस रिसर्च की सबसे सकारात्मक बात यह है कि यह बढ़ा हुआ जोखिम केवल दवाओं के सक्रिय इस्तेमाल के दौरान ही बना रहता है। जैसे ही कोई महिला इन हार्मोनल पिल्स या इंजेक्शन का सेवन बंद करती है, अगले पांच वर्षों के भीतर ट्यूमर का यह अतिरिक्त खतरा घटकर पूरी तरह सामान्य स्तर पर आ जाता है।
स्त्री रोग विज्ञान (Obstetrics and Gynecology) के एसोसिएट प्रोफेसर जीनो पेकोरारो ने इस वैश्विक अध्ययन पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह रिपोर्ट किसी भी दवा को पूरी तरह प्रतिबंधित करने के लिए नहीं, बल्कि सजगता बढ़ाने के लिए है। महिलाओं को चाहिए कि वे बिना किसी योग्य डॉक्टर की लिखित सलाह और नियमित जांच के इन संवेदनशील हार्मोनल दवाओं का सेवन स्व-इच्छा से न करें। यदि कोई महिला इन पिल्स के दुष्प्रभावों को लेकर आशंकित है, तो वह अपने गायनेकोलॉजिस्ट से संपर्क कर गैर-हार्मोनल और पूरी तरह सुरक्षित वैकल्पिक गर्भनिरोधक माध्यमों का चयन कर सकती है।

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