मुहर्रम की सातवीं तारीख पर निकली बाबाओं की सवारियां, उमड़ा आस्था का सैलाब
बड़वानी। मोहर्रम के मुकद्दस महीने को लेकर शहर में मजहबी उत्साह और अकीदत का माहौल चरम पर है। मंगलवार की रात सातवीं तारीख के मौके पर पूरा इलाका 'या हुसैन' के नारों से गुंजायमान हो उठा। इस खास मौके पर पारंपरिक तौर पर 'शेर' और 'बाबाओं की सवारियां' निकाली गईं, जिसमें अकीदतमंदों का हुजूम उमड़ पड़ा।
अमन, भाईचारे और कौमी एकता की मिसाल
ताशों की मातमी धुनों के बीच मन्नत पूरी होने की खुशी में बच्चों और युवाओं ने शेर का रूप धारण कर गश्त किया। अपनी खास पारंपरिक वेशभूषा में निकले इन युवाओं और बच्चों को देखने के लिए सड़कों पर लोगों का तांता लगा रहा। इस दौरान युवाओं की टोलियों ने अलग-अलग ताजिया खानों में जाकर लोबान (धूप) पेश की और समाज में आपसी सौहार्द व भाईचारे का पैगाम दिया।
देर रात तक जुटी रही जायरीनों की भीड़
सातवीं की रात को शहर के अलग-अलग कोनों से बाबाओं की सवारियां निकाली गईं। इन रस्मों में शामिल होने और जियारत करने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। लोगों ने पूरी आस्था के साथ मन्नतें मांगी और हाजिरी दी। देर रात तक शहर की प्रमुख सड़कें और चौराहे मजहबी रंग में रंगे नजर आए।
पीढ़ियों पुरानी परंपराओं का हो रहा निर्वाह
बड़वानी में ताजियादारी का इतिहास दशकों पुराना है, जिसे आज की पीढ़ी भी पूरी शिद्दत और श्रद्धा के साथ संजोए हुए है। शहर के अलग-अलग कमेटियों द्वारा बेहद खूबसूरत और नक्काशीदार ताजियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। आकर्षक सजावट, बारीक कलाकृति और बेहतरीन रोशनी से सजे ये ताजिए इस मर्तबा भी लोगों के आकर्षण का मुख्य केंद्र रहेंगे।
जियारत के लिए सजेंगे ताजिए, सबीलों का हुआ इंतजाम
मोहर्रम की दसवीं तारीख यानी 26 जून की रात को सभी ताजिए आम अकीदतमंदों के दर्शन (जियारत) के लिए चौराहों पर रखे जाएंगे, जिसके बाद मुख्य धार्मिक रस्में पूरी की जाएंगी। इस दौरान जगह-जगह राहगीरों के लिए पानी, शरबत और दूध की सबीलें लगाई जा रही हैं। मोहर्रम के दौरान भूखे-प्यासों की सेवा करना बेहद सवाब (पुण्य) का काम माना जाता है, जिसमें लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं।
मजलिसों और तकरीरों से गूंज रहे मोहल्ले
त्योहार के मद्देनजर पूरे शहर के रास्तों, गलियों और चौराहों को विशेष झंडों और रंग-बिरंगी लाइटों से रोशन किया गया है। हर रोज मस्जिदों और इमामबाड़ों में कुरआन ख्वानी, मजलिसों और मजहबी तकरीरों का सिलसिला चल रहा है, जहां उलेमा कर्बला के मैदान में हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों द्वारा दी गई महान कुर्बानी को याद कर हक, सब्र और इंसानियत की सीख दे रहे हैं।

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