Betul Political Controversy: त्वरित टिप्पणी: कांग्रेस करे तो अपराध, एबीवीपी करे तो आंदोलन? बैतूल में दोहरे मापदंड पर सवाल
► मयूर भार्गव ♦
सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई॥
समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं। रबि पावक सुरसरि की नाईं॥
Betul Political Controversy: गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा श्रीरामचरित मानस के बालकाण्ड में लिखी गई यह चौपाई आज की प्रसिद्ध लोकोक्ति है। इसका अर्थ और भाव यह है कि जिस प्रकार सूर्य (रवि), अग्नि (पावक) और गंगा नदी (सुरसरि) अच्छे और बुरे (पवित्र और अपवित्र) सभी को अपने में समाहित कर लेते हैं या संपर्क में आने पर भी उन पर कोई दोष या दाग नहीं लगता, उसी प्रकार सामथ्र्यवान (शक्तिशाली) व्यक्ति के किसी भी कार्र्य को समाज दोषपूर्ण नहीं मानता। वर्तमान में सुशासन के नाम पर भी ऐसा ही कुछ चल रहा है।
बैतूल जिला मुख्यालय पर 28 मई 2026 को कांग्रेसियों ने देश के गृहमंत्री का पुतला इसलिए दहन किया क्योंकि दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अमित शाह ने आदिवासियों को वनवासी कह दिया था। कांग्रेस ने इसे मुद्दा बनाया और देश व्यापी आंदोलन का रूप दे दिया। वैसे तो पुतला दहन होते रहे हैं और होते भी रहेंगे लेकिन इसमें खास बात यह है कि पुतला दहन करने वाले आदिवासी कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष रामू टेकाम, जिलाध्यक्ष पंजाब अहाके, कांग्रेस नेता राजेश गावंडे सहित अन्य कांग्रेसी नेताओं पर बीएनएस की धारा 287 के तहत यह कहते हुए कोतवाली में मामला दर्ज किया गया है कि पुतला लेकर भागने से वे स्वयं के साथ दूसरे को भी नुकसान पहुंचा सकते थे। चूंकि प्रदर्शन कांग्रेसी कर रहे थे और प्रदेश सहित देश में सरकार भाजपा की है। इसलिए सामथ्र्यवान भाजपा सरकार के निर्देश पर कांग्रेसियों पर आनन-फानन में मामला दर्ज कर लिया गया।
अब चलो दूसरी बात करते हैं। 29 मई 2028 को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) कार्यकर्ता फीस और छात्रावास की मांग को लेकर कलेक्ट्रेट पहुंचे। यहां पर कलेक्टर से मिलने की जिद करते हुए अड़ गए लेकिन कलेक्टर के मौजूद नहीं होने पर कार्यकर्ता इतने अधिक गुस्से में बिगड़ गए कि उन्होंने यहां पर सुरक्षा में तैनात दो पुलिसकर्मियों से झूमाझटकी कर उन्हें गिरा दिया। इतना ही नहीं कार्यकर्ता सीधे नारेबाजी करते हुए कलेक्ट्रेट के भीतर घुस गए और हाथों में मांगों से संबंधित तख्तियां लेकर नारेबाजी करने लगे।
अब सवाल यह उठता है कि इंटीग्रेटेड कलेक्ट्रेट जहां तमाम विभागों के कार्यालय है। यहां पर इस तरह से पुलिसकर्मियों को गिराकर भीतर प्रवेश करना और नारेबाजी करते हुए प्रदर्शन करना क्या शासकीय कार्य में व्यवधान नहीं है? क्या यह उचित था? प्रदर्शन का अपना एक तरीका होता है। अगर कांग्रेसियों ने प्रदर्शन गलत किया है तो ऐसी कौन सी डिक्शनरी है जिसमें एबीवीपी के प्रदर्शन को सही साबित किया जा सकता है? जबकि एबीवीपी शुचिता और संस्कार की बात करने वाले भारतीय जनता पार्टी का अनुषांगिक संगठन है उसे तो कम से कम यह तमीज तो होना ही चाहिए कि प्रदर्शन किस तरह से किया जाना चाहिए।

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