प्रदोष व्रत कथा से पूरी होती है सभी मनोकामनाएं
सनातन धर्म में व्रत का विशेष महत्व है, लेकिन किसी भी व्रत की पूर्णता उसकी कथा के पाठ से ही होती है। शास्त्रों के अनुसार, अगर कोई जातक पूरे दिन व्रत रखकर महादेव की सेवा करता है, लेकिन प्रदोष काल में व्रत कथा का पाठ नहीं करता, तो उसकी पूजा अधूरी मानी जाती है। इसलिए व्रत के साथ उसकी कथा का पाठ भी जरूर करें या फिर सुनें।
प्रदोष व्रत की कथा अटूट विश्वास और भक्ति का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रदोष काल में स्वयं महादेव और माता पार्वती कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा में नृत्य करते हैं। इस समय कथा पढ़ने से जातक का मन पवित्र होता है और वह अनजाने में किए गए पापों का नाश होता है।
प्राचीन काल में एक ब्राह्मणी थी, जिसके पति का देहांत हो चुका था। उसका कोई सहारा नहीं था, इसलिए वह सुबह होते ही अपने पुत्र के साथ भीख मांगने निकल पड़ती थी। वह खुद भी भिक्षा मांगती और अपने पुत्र का भी पालन-पोषण करती थी। एक दिन जब वह भिक्षा मांगकर लौट रही थी, तो उसे नदी किनारे एक सुंदर बालक दिखाई दिया, जो बहुत उदास बैठा था। वह बालक विदर्भ देश का राजकुमार था। शत्रुओं ने उसके पिता को युद्ध में मार दिया था और उसका राज्य छीन लिया था। ब्राह्मणी को उस बालक पर दया आ गई। वह उसे अपने घर ले आई और अपने पुत्र के समान ही उसका पालन-पोषण करने लगी। कुछ समय बाद, ब्राह्मणी अपने दोनों पुत्रों के साथ शांडिल्य ऋषि के आश्रम गई। वहां ऋषि ने उन्हें प्रदोष व्रत की महिमा बताई और व्रत करने की विधि सिखाई। ब्राह्मणी ने श्रद्धापूर्वक प्रदोष व्रत करना शुरू कर दिया।
कुछ समय बाद, दोनों बालक वन में विहार कर रहे थे। वहां उनकी भेंट कुछ गंधर्व कन्याओं से हुई। राजकुमार धर्मगुप्त एक गंधर्व कन्या अंशुमती पर मोहित हो गए। गंधर्व कन्या के पिता को जब पता चला कि वह राजकुमार है, तो उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार धर्मगुप्त से कर दिया। राजकुमार ने गंधर्व राज की सेना की सहायता से अपने शत्रुओं पर आक्रमण किया और अपना खोया हुआ विदर्भ देश का राज्य वापस जीत लिया। उसने ब्राह्मणी के पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बनाया और उस ब्राह्मणी को राजमाता का सम्मान दिया।
जब ब्राह्मणी ने राजकुमार से उसकी सफलता का कारण पूछा, तो उसने कहा कि यह सब प्रदोष व्रत के प्रभाव और महादेव की कृपा का फल है। तब से यह मान्यता चली आ रही है कि जो भी व्यक्ति प्रदोष व्रत रखकर इस कथा का पाठ करता है, उसके जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और सुख-शांति की प्राप्ति होती है।
प्रदोष व्रत की कथा हमेशा सूर्यास्त के समय, यानी प्रदोष काल में ही पढ़नी चाहिए।
अगर हो पाए, तो परिवार के साथ बैठकर कथा सुनें। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। जो जातक इस कथा का पाठ करते हैं, उन्हें कर्ज से मुक्ति, संतान सुख और अच्छे स्वास्थ्य का आशीर्वाद मिलता है।

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