वोटर लिस्ट पुनरीक्षण मामले में आज सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, SIR पर टिकी निगाहें
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट आज (बुधवार) चुनाव आयोग की 'मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना बड़ा फैसला सुना सकता है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की बेंच ने इस साल की शुरुआत में (29 जनवरी को) लंबी सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
याचिकाकर्ताओं ने क्यों उठाए सवाल?
याचिकाओं में चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे इस 'एसआईआर' (SIR) अभियान की कानूनी वैधता को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह पूरी प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 के नियमों के खिलाफ है।
विवाद की मुख्य वजह चुनाव आयोग की एक सख्त शर्त है। इसके तहत, जिन मतदाताओं का नाम साल 2002 या 2003 की वोटर लिस्ट में नहीं था, उन्हें वोटिंग लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिए यह साबित करना होगा कि उनका उस व्यक्ति से पारिवारिक संबंध है, जिसका नाम 2002 या 2003 की सूची में पहले से दर्ज था।
गरीबों और प्रवासियों के अधिकार छीनने का डर
याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दलील दी कि चुनाव आयोग की इस शर्त के कारण गरीब, मजदूर, प्रवासी और पिछड़े तबके के लोग अपने वोट के अधिकार से वंचित हो सकते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि इन लोगों के पास 20-22 साल पुराने रिकॉर्ड या पारिवारिक संबंधों को साबित करने वाले दस्तावेजी सबूत मिलना बेहद मुश्किल है।
इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आम जनता को राहत देने के लिए कुछ अंतरिम निर्देश भी दिए थे। पहले चुनाव आयोग ने पहचान के लिए 11 दस्तावेज तय किए थे, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद पहचान पत्र के रूप में [Aadhaar Redacted] को भी इस प्रक्रिया में शामिल करने का निर्देश दिया गया था।
चुनाव आयोग का क्या पक्ष है?
इस मामले से जुड़ी ज्यादातर याचिकाएं पिछले साल जून में तब दायर की गई थीं, जब चुनाव आयोग ने बिहार से इस एसआईआर (SIR) अभियान की शुरुआत की थी। बाद में इस अभियान को पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु समेत देश के कई अन्य राज्यों में भी लागू कर दिया गया।
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि वोटर लिस्ट को पूरी तरह साफ, शुद्ध और गलतियों से मुक्त बनाने के लिए यह अभियान बहुत जरूरी है। आयोग के मुताबिक, इसका उद्देश्य फर्जी या अयोग्य मतदाताओं के नामों को लिस्ट से बाहर करना है। अब देखना होगा कि देश की सबसे बड़ी अदालत इस मामले पर क्या रुख अपनाती है।

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