“हिंदू किसी भी मंदिर में जा सकता है”: सबरीमाला सुनवाई में जस्टिस नागरत्ना की बड़ी टिप्पणी
नई दिल्ली। केरल के ऐतिहासिक सबरीमाला मंदिर मामले और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे को लेकर सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ में गहन कानूनी बहस जारी है। सुनवाई के आठवें दिन जस्टिस बीवी नागरत्ना ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण मौखिक टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि हिंदू समाज में संप्रदाय के आधार पर किसी को पूजा के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
"हिंदू समाज को एकजुट होना चाहिए"
जस्टिस नागरत्ना ने सुनवाई के दौरान इस बात पर जोर दिया कि एक हिंदू मूलतः हिंदू ही है और उसे देश के किसी भी मंदिर में जाने का अधिकार है। उन्होंने कहा:
"हिंदू समाज को एकजुट होना चाहिए। मंदिरों को विशिष्ट संप्रदाय (Denomination) की रेखाओं पर दूसरों को बाहर नहीं करना चाहिए। इस तरह का अलगाव न केवल समाज को बांटता है, बल्कि अंततः उस विशेष संप्रदाय को भी कमजोर करता है।"
संप्रदाय बनाम व्यापक हिंदू पहचान
सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ इस कानूनी सवाल का हल खोज रही है कि क्या कोई धार्मिक संप्रदाय अपने विशेष रीति-रिवाजों का हवाला देकर दूसरों के प्रवेश पर रोक लगा सकता है। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने दक्षिण भारत का उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया:
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विविधता का सम्मान: दक्षिण भारत में शैव और वैष्णव जैसे पूजा के विभिन्न रूप प्रचलित हैं और वे संवैधानिक रूप से संरक्षित भी हैं।
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समान अधिकार: पूजा की पद्धति अलग होने का अर्थ यह कतई नहीं है कि एक हिंदू को दूसरे संप्रदाय के मंदिर में जाने से रोका जाए।
क्यों अहम है यह सुनवाई?
यह मामला न केवल सबरीमाला मंदिर से जुड़ा है, बल्कि इसका सीधा असर मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, पारसी महिलाओं के अधिकार और दाऊदी बोहरा समुदाय जैसे कई अन्य धार्मिक मुद्दों पर भी पड़ेगा। कोर्ट इस पर विचार कर रहा है कि:
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क्या धार्मिक संप्रदायों के पास 'अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं' (Essential Religious Practices) के तहत पूर्ण स्वायत्तता है?
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क्या संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) और समानता का अधिकार किसी भी धार्मिक नियम से ऊपर है?

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