आंध्र प्रदेश विधानसभा में अमरावती पर बड़ा फैसला, सीएम नायडू का केंद्र से अनुरोध
नई दिल्ली | आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने राज्य विधानसभा में अमरावती को स्थायी राजधानी के रूप में मान्यता देने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया। इसके साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार से अमरावती को आधिकारिक तौर पर राजधानी का कानूनी दर्जा देने की भी मांग की। यह प्रस्ताव एक विशेष विधानसभा सत्र के दौरान लाया गया, जिसमें विपक्षी पार्टी वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP) के विधायक मौजूद नहीं रहे।
इस प्रस्ताव के पीछे की कहानी
दरअसल, अमरावती की कहानी आंध्र प्रदेश के 2014 के विभाजन से जुड़ी है। आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2014के तहत राज्य दो हिस्सों आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में बंट गया था। उस समय तय किया गया था कि हैदराबाद 10 साल तक दोनों राज्यों की साझा राजधानी रहेगा और इस दौरान आंध्र प्रदेश को अपनी नई राजधानी विकसित करनी होगी।इसी पृष्ठभूमि में नायडू ने अमरावती को अपनी ड्रीम राजधानी परियोजना के रूप में आगे बढ़ाया। 2014 में सत्ता में आने के बाद उन्होंने विशेषज्ञों की मदद से अमरावती को राजधानी के रूप में चुना और विकास की दिशा में कदम बढ़ाए। हालांकि, परियोजना को पर्यावरणीय और वित्तीय चुनौतियों का सामना करना पड़ा, बावजूद इसके राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण से राहत मिलने के बाद इसके आगे बढ़ने की उम्मीद जगी थी।लेकिन 2019 के विधानसभा चुनाव में बड़ा राजनीतिक बदलाव हुआ। वाई एस जगन मोहन रेड्डी के नेतृत्व में YSRCP ने भारी बहुमत हासिल किया और सत्ता में आने के बाद अमरावती परियोजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया। नई सरकार ने विदेशी बैंकों से लिए जाने वाले कर्ज को भी वापस कर दिया और तीन राजधानियों अमरावती (विधायी), विशाखापट्टनम (कार्यकारी) और कुरनूल (न्यायिक) का प्रस्ताव सामने रखा।अब एक बार फिर सत्ता में लौटे नायडू ने अमरावती को स्थायी राजधानी बनाने की दिशा में कदम बढ़ाते हुए इस मुद्दे को राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से पुनर्जीवित कर दिया है। यह प्रस्ताव न केवल राज्य की राजधानी को लेकर जारी असमंजस को खत्म करने की कोशिश है, बल्कि पिछले एक दशक से चल रही राजनीतिक खींचतान का नया अध्याय भी खोलता है।

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