मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का सख्त रुख, सोम डिस्टिलरीज को नहीं मिली राहत
सोम डिस्टलरीज प्राइवेट लिमिटेड की याचिका खारिज करने के संकेत, कोर्ट ने कहा—“कोई संतोषजनक जवाब नहीं”
फर्जी ट्रांजिट परमिट से शराब परिवहन को कोर्ट ने माना गंभीर अपराध, राजस्व नुकसान पर भी जताई चिंता,कर्मचारियों की दोषसिद्धि का असर कंपनी पर भी, “अल्टर ईगो” सिद्धांत लागू होने के संकेत
भोपाल। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में 23 मार्च 2026 को न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की एकलपीठ के समक्ष हुई सुनवाई में सोम डिस्टिलरीज प्राइवेट लिमिटेड बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में कंपनी को बड़ा झटका लगता दिख रहा है।
कंपनी द्वारा अपने लाइसेंस निलंबन
(04 फरवरी 2026) को चुनौती देने वाली रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए कि प्रथम दृष्टया आबकारी विभाग की कार्रवाई कानून के अनुरूप है। “फर्जी परमिट, कोई सफाई नहीं” – कोर्ट की सख्त टिप्पणी
अदालत ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि:
1200 पेटी विदेशी शराब का परिवहन फर्जी ट्रांजिट परमिट के आधार पर किया गया याचिकाकर्ता कंपनी अपने जवाब में इस गंभीर आरोप का कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं दे सकी कोर्ट ने टिप्पणी की कि इस तरह की चुप्पी अप्रत्यक्ष रूप से अपराध स्वीकार करने जैसी स्थिति पैदा करती है।

कर्मचारियों की सजा, कंपनी भी जिम्मेदार
राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता ने दलील दी कि कंपनी के कर्मचारियों और संबंधित व्यक्तियों को भारतीय दंड संहिता की धाराओं 420, 467, 468, 471 और 120-B सहित,तथा मध्य प्रदेश आबकारी अधिनियम 1915 की धारा 34(2) के तहत दोषी ठहराया जा चुका है
“ कर्मचारी या एजेंट द्वारा किया गया अपराध, लाइसेंसधारी कंपनी पर भी लागू होगा।”
अदालत ने “अल्टर ईगो” सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि कंपनी अपने अधिकारियों/एजेंट्स के कार्यों से अलग नहीं हो सकती। याचिकाकर्ता की दलीलें कमजोर पड़ीं
कंपनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नमन नागराथ ने तर्क दिया कि:
कारण बताओ नोटिस पुराने लाइसेंस अवधि (2023-24) से जुड़ा था नए लाइसेंस (2024-25, 2025-26) पर इसका असर नहीं होना चाहिए
लेकिन कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा:
“आबकारी अधिनियम की धारा 31 के तहत कार्रवाई का आधार अपराध है, न कि सिर्फ लाइसेंस की अवधि।” प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन का दावा भी खारिज,कोर्ट ने पाया कि:कारण बताओ नोटिस में आरोप स्पष्ट थे सुनवाई का पर्याप्त अवसर दिया गया जवाब भी प्राप्त हुए इसलिए, प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन का दावा टिक नहीं पाया। “शराब व्यापार मौलिक अधिकार नहीं”
अदालत ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा:
“शराब का व्यापार कोई मौलिक अधिकार नहीं है” और राज्य को इस क्षेत्र में सख्त नियंत्रण का अधिकार है, खासकर जब मामला राजस्व नुकसान और धोखाधड़ी से जुड़ा हो।
कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर रुख साफ किया:
फ्रॉड सभी कार्यवाहियों को शून्य कर देता है,आनुपातिकता के सिद्धांत के तहत भी निलंबन उचित सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले इस *मामले में लागू नहीं
क्या है मामला ?
2011 में फर्जी परमिट के जरिए शराब परिवहन का मामला ट्रायल कोर्ट से कई आरोपियों की दोषसिद्धि उसी आधार पर 2024 में कारण बताओ नोटिस इस सुनवाई से साफ संकेत मिल रहे हैं कि सोम डिस्टलरी के लिए कानूनी लड़ाई मुश्किल होती जा रही है। अगर अंतिम आदेश भी इसी दिशा में आता है, तो यह मामला मध्य प्रदेश में शराब कारोबार और आबकारी नियंत्रण के लिए एक बड़ा नज़ीर बन सकता है।

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