Betul Garbage Segregation: कचरा सेग्रीगेशन फेल, ओम साईं विजन कंपनी की मनमानी से शहर की सफाई व्यवस्था बेपटरी
Betul Garbage Segregation: बैतूल (राष्ट्रीय जनादेश)। शहर में डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन का कार्य कर रही ओम साईं विजन कंपनी टेंडर की शर्तों को ताक पर रख किस कदर हर क्षेत्र में अपनी मनमानी कर रही है, यह उसकी कार्यप्रणाली से आसानी से समझा जा सकता है। एक ओर जहां कचरा लेने वाहन पूरे महीने न जाकर 15 दिन ही पहुंच रहे हैं। वहीं दूसरी ओर न तो कचरे का मौके पर ही सेग्रीगेशन किया जा रहा है और न ही आईईसी गतिविधियों पर ही कोई ध्यान कंपनी का है। आलम यह है कि स्वच्छता सर्वेक्षण में जिसकी जिम्मेदारी शहर की रैकिंग बढ़वाने की है, वही कंपनी हर महीने लाखों रुपये लेने के बाद भी हर साल रैकिंग को गिरवाने में ताकत से जुटी है।
बीते कई सालों से डोर-टू-डोर कलेक्शन का काम ओम साईं विजन कंपनी द्वारा किया जा रहा है, लेकिन लगता नहीं कि इस कंपनी के काम करने और उसे लाखों रुपये भुगतान करने का कोई लाभ शहर या शहरवासियों को मिल रहा है। स्थिति यह है कि स्वच्छता सर्वेक्षण में हर साल शहर की रैंकिंग गिरती ही जा रही है। इस साल रैंकिंग में और गिरावट आने के पूरे आसार नजर आ रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि कंपनी को लाखों रुपये का भुगतान देकर जो काम करवाए जाना हैं, वे काम न कंपनी कर रही है और न ही नपा के अधिकारी उससे करवा रहे हैं। कंपनी पूरी तरह से अपनी मनमर्जी से काम कर रही है। इससे कंपनी तो तगड़ा मुनाफा कमा रही है, लेकिन नगर पालिका और शहर को उतना ही नुकसान पहुंच रहा है।

अलग-अलग लेना है गीला-सूखा कचरा
टेंडर की शर्तों के अनुसार कंपनी को हर घर से गीला और सूखा कचरा अलग-अलग लेना है। इसके लिए नपा द्वारा कुछ वाहनों में पार्टिशन भी करवाया गया था। यह बात अलग है कि कुछ वाहनों में आज तक न तो पार्टिशन हो सका है और न ही जिन वाहनों में पार्टिशन करवाया जा चुका है, उनका सही उपयोग ही हो पा रहा है। लोग अपने घरों में गीला-सूखा कचरा एक साथ जमा करते हैं और उसे एक साथ ही कचरा वाहन में डाल देते हैं। ट्रेंचिंग ग्राउंड पर उत्पन्न हुई समस्या की एक बड़ी वजह ओम साईं विजन कंपनी की यह बड़ी लापरवाही भी मुख्य रूप से जिम्मेदार है।
लोगों को जागरूक करना कंपनी का काम
लोग गीला और सूखा कचरा अलग-अलग रखें और दें, इस बात के लिए जागरूक करना ओम साईं विजन का काम है। इसके लिए आईईसी (सूचना, शिक्षा, संचार) गतिविधियों के नाम पर कंपनी को तगड़ा भुगतान भी किया जाता है। कंपनी यह भुगतान तो अधिकार से लेती है, लेकिन आईईसी गतिविधियों के नाम पर कुछ नहीं करती। आईईसी गतिविधियों के नाम पर कंपनी के कुछ कर्मचारी वार्डों में जाकर फोटो भर खिंचवा लेते हैं और फाइलें बनाकर भुगतान के लिए प्रस्तुत कर देते हैं। नपा के जिम्मेदार अधिकारी भी इसे आंख मूंदकर अनुमोदित कर देते हैं, जिससे कंपनी का बेरोकटोक भुगतान जारी रहता है। इसके विपरीत जमीन पर आईईसी गतिविधियों के नाम पर कुछ नहीं होता। यही कारण है कि लोग आज तक भी गीला-सूखा कचरा अलग-अलग रखने की आदत नहीं बना पाए, जबकि कंपनी लगातार 7-8 सालों से यह काम संभाल रही है।
वाहनों पर नहीं रहते आईईसी मेंबर
वार्डों में जागरूकता गतिविधियां चलाने के अलावा हर कचरा वाहन पर ड्राइवर, हेल्पर के अलावा आईईसी मेंबर का होना भी अनिवार्य है। आईईसी मेंबर की जिम्मेदारी है कि वह लोगों को जागरूक करने के साथ ही इस बात पर भी नजर रखें कि गीला-सूखा कचरा एक साथ तो नहीं है। यदि ऐसा है तो उसे मौके पर ही दोनों कचरे अलग-अलग करवाना है और वाहन में अलग-अलग डलवाना है, लेकिन वार्डों में पहुंचने वाले कचरा वाहनों पर कभी आईईसी मेंबर नजर ही नहीं आते। वाहनों पर केवल ड्राइवर-हेल्पर ही रहते हैं। कुछ वाहनों पर तो हेल्पर भी नहीं रहते और केवल ड्राइवर से ही काम चला लिया जाता है। दूसरी ओर कंपनी द्वारा हर कार्य के लिए तय संख्या में कर्मचारी रखे जाने का दावा करते हुए पूरा-पूरा भुगतान लिया जाता है। गौरतलब है कि कंपनी को 120 कर्मचारी रखने है।
नपा के अधिकारी नहीं करते औचक निरीक्षण
ऐसा लगता ही नहीं कि नगर पालिका के अधिकारी औचक निरीक्षण कर कभी यह देखने की कोशिश करते हैं कि कंपनी टेंडर की शर्तों के अनुरूप काम कर भी रही है कि नहीं। यही कारण है इतनी खामियों के साथ काम करने के बावजूद आज तक कंपनी के खिलाफ एक बार भी कोई कार्रवाई नहीं की गई है और न ही उसका कोई भुगतान काटा या रोका गया हो। यदि अधिकारियों द्वारा टेंडर की शर्तों के अनुरूप कंपनी से कार्य कराए जाते तो शहर में यह बदहाली नहीं रहती और बैतूल शहर सर्वेक्षण में लगातार नीचे जाने के बजाय लगातार ऊपर की ओर जाता रहता। अब अधिकारी कंपनी पर सख्ती करने के बजाय इतनी मेहरबानी क्यों दिखाते हैं, इसे लेकर शहर में अलग-अलग तरह की चर्चाएं चलती रहती है।

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