Mango Blossom Drop Betul: बैतूल (राष्ट्रीय जनादेश)। इस साल आम के पूरी तरह आम लोगों की पहुंच होने की खुशफहमी पाले लोगों को अब आम के खास होने की चिंता सताने लगी है। इसकी वजह यह है कि एक सप्ताह पहले तक जो आम के पेड़ बौर से पूरी तरह लदे थे, वे अब पूरी तरह सुनसान नजर आ रहे हैं। पेड़ों पर लदी बौर पूरी तरह से झड़ चुकी है। यह स्थिति भी तब बनी है, जब न जिले में मावठा या ओले बरसे और न ही आंधी-तूफान का मौसम ही बना। इससे आम का बंपर उत्पादन की संभावनाएं भी कम हो गई हैं। 

आम हो या खास, बुजुर्ग हो या बच्चे, सभी को आम बेहद पसंद होते हैं। यही कारण भी है कि आम फलों का राजा कहलाता है। आम के पेड़ों में जनवरी-फरवरी माह से बौर आने शुरू हो जाते हंै। इसके बाद मार्च-अप्रैल में कैरी और मई-जून में पके आमों की आवक हो जाती है। आम की फसल कम होने पर इसके दाम अधिक हो जाते हैं और खास लोग ही इसे खरीद पाते हैं। वहीं आम का अच्छा उत्पादन होने पर गरीब से गरीब परिवार भी इनका लुत्फ ले पाते हैं। इस साल आम के पेड़ों पर बौर की जो रौनक थी, उसे देखकर आम लोग बेहद खुश थे। उन्हें लग रहा था कि इस बार आम का बड़े पैमाने पर उत्पादन होगा और वे इनका आनंद आसानी से ले सकेंगे। 

पहले यह थी जिले भर में स्थिति 

इस साल आम का बंपर उत्पादन होने की पूरी संभावना थी। एक सप्ताह पहले तक आम के 80 फीसदी से ज्यादा पेड़ बौर से लदे हुए थे। आम के पेड़ों में इतने बौर आए थे कि हरी पत्तियां पूरी तरह ढंक गई थी और पेड़ पूरे पीले नजर आ रहे थे। अधिकांश पेड़ों की स्थिति यह थी कि यदि सभी बौर फल में तब्दील हो जाते तो वह पेड़ इनका वजन तक नहीं सह पाते। इन्हीं सब कारणों से आम की बंपर पैदावार की संभावना जताई जा रही थी। 

बीत चुका था खराब मौसम का दौर 

इस संभावना को इसलिए भी बल मिल रहा था क्योंकि खराब मौसम का दौर भी बीत चुका था। बसंत पंचमी के दौरान चलने वाली तेज हवाओं और महाशिवरात्रि के समय आंधी, बारिश, ओलावृष्टि आदि से आम की अधिकतर बौर झड़ जाती थी। इससे आम की पैदावार कम होती थी। इस साल बसंत पंचमी और महाशिवरात्रि पर्व निकल चुके थे। इस दौरान कई जिलों में मौसम बिगड़ा पर बैतूल जिले में मौसम पूरी तरह साफ रहा। यहां आंधी, तूफान, बारिश का मौसम ही नहीं बना। इससे लग रहा था कि इस साल मौसम भी साथ दे रहा है। 

इसके बावजूद पेड़ों से झड़ गए बौर 

मौसम पूरी तरह अनुकूल रहने के बावजूद इस साल आम के पेड़ से बौर झड़ गए हैं। महज एक सप्ताह में ही पेड़ों का नजारा ही बदल गया है। पहले जो पेड़ बौर से लदे थे, उनमें से अधिकांश पर अब बौर ढूंढने पर भी नहीं मिल रहे हैं। इससे किसानों और आम उत्पादकों में हैरत के साथ-साथ चिंता भी है। वे आम की बिक्री से जितनी कमाई की उम्मीदें लगाए बैठे थे, वह उम्मीदें भी अब धूमिल होती नजर आ रही है। उन्हें यह समझ ही नहीं आ रहा है कि मौसम नहीं बिगड़ने के बावजूद यह क्यों और कैसे हो गया। 

जानकार यह बता रहे इसका कारण 

इस संबंध में जेएच कॉलेज बैतूल के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. एमके मेहता कहते हैं कि जो बौर झड़ गए, वे प्री-मैच्योर बौर थे। उनकी साइकिल जल्दी कंपलीट हो गई, इसलिए वे झड़ गए। उनके अनुसार हर पांच साल में ऐसा चक्र आता ही है कि बड़ी तादाद में बौर फल बनने तक (फ्रुटीन) पहुंच ही नहीं पाते और झड़ जाते हैं। यह स्थिति बनने के लिए तापमान में तेजी से आया उतार-चढ़ाव भी जिम्मेदार है। इस बार तापमान अचानक तेजी से बढ़ा है। इसके अलावा यदि पूरे बौर फल बन जाते तो पेड़ भी उनका भार नहीं सह पाते। इसलिए प्रकृति भी संतुलन बनाती है। इन सबके बावजूद ऐसा नहीं होगा कि आम खास हो जाएगा। डॉ. मेहता आगे कहते हैं कि सभी जगह और सभी पेड़ों से बौर पूरी तरह नहीं झड़े हैं। अभी भी कई क्षेत्रों में पेड़ों पर काफी बौर हैं और कैरी बनना भी शुरू हो गई है। इसलिए आम का बंपर न सही पर अच्छा उत्पादन होगा। अब यदि बारिश भी हो जाती है तो भी आम की फसल पर असर नहीं पड़ेगा। 

बैतूल के गाजरिया की जमकर है मांग

गौरतलब है कि बैतूल जिले की गिनती आम उत्पादक जिलों में होती है। जिले में गाजरिया आम बहुतायत में होता है। इसकी डिमांड प्रदेश ही नहीं प्रदेश के बाहर भी रहती है। इसके साथ ही यहां लंगड़ा, चौसा, आम्रपाली, तोतापरी, नीलम आम की प्रजातियां भी प्रचुरता से होती है। आम उत्पादक उम्मीद लगाए थे कि आम का बंपर उत्पादन होने पर उनकी आमदनी भी अच्छी हो सकेगी। अब पेड़ों की बदहाली देखकर वे थोड़े मायूस नजर आ रहे हैं।