तारिक ने सत्ता संभालते ही सेंट्रल बैंक के गवर्नर को हटाया, बांग्लादेश में मचा घमासान
ढाका। बांग्लादेश में सरकार बदलने के बाद भी घमासान थमा नहीं है। अब विवाद सेंट्रल बैंक के गवर्नर को लेकर है। जब मोहम्मद यूनुस की सरकार थी तो उन्होंने अहसान हबीब मंसूर को कमान सौपी थी, लेकिन तारिक रहमान ने सत्ता संभाले ही उन्हें निकाल दिया। सरकार ने अब मोस्तकुर रहमान को बांग्लादेश बैंक का नया गवर्नर बनाया है और इस फैसले ने पूरे देश के आर्थिक और राजनीतिक गलियारों में आग लगा दी है। लोग सवाल कर रहे हैं कि एक कारोबारी को बैंक की चाबी क्यों दे दी गई?
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अहसान हबीब मंसूर जो गवर्नर थे वो जाने-माने अर्थशास्त्री भी थे और उन्हें मोहम्मद यूनुस वाली अंतरिम सरकार ने नियुक्त किया था। उनका कार्यकाल 2028 तक था, लेकिन उन्हें अचानक हटा दिया गया। हैरानी की बात ये है कि मंसूर को खुद नहीं पता था कि उन्हें हटाया जा रहा है। उन्होंने मीडिया से कहा कि न मैंने इस्तीफा दिया, न मुझे आधिकारिक तौर पर हटाया गया। मैंने टीवी पर खबर देखी, तो अपना बोरिया-बिस्तर समेटा और घर चल दिया।
एक रिपोर्ट के मुताबिक अब तक की परंपरा ये रही है कि सेंट्रल बैंक का गवर्नर कोई बड़ा बैंकर, अर्थशास्त्री या अनुभवी अफसर बनता है, लेकिन मोस्तकुर रहमान एक गारमेंट कारोबारी हैं। उनका बैंकिंग या मॉनेटरी पॉलिसी से कोई लेना-देना नहीं है। ऊपर से वह खालिदा जिया की पार्टी में काफी सक्रिय रहे हैं यानी एक राजनैतिक कारोबारी को बैंक की कमान सौंप दी गई है।
सबसे बड़ा बवाल मोस्तकुर रहमान के पिछले रिकॉर्ड को लेकर है। खबरों के मुताबिक गवर्नर बनने के कुछ महीने पहले उनके अपनी कंपनी ‘हेरा स्वेटर्स’ के 89 करोड़ टका के फंसे हुए लोन को री-शेड्यूल किया गया था। उन्हें 10 साल में पैसा लौटाने की मोहलत दी गई। अब सवाल ये उठ रहा है कि जो आदमी खुद अपनी कंपनी के लिए बैंकों से रियायतें ले रहा था, वह पूरे देश के बैंकिंग सिस्टम को ईमानदारी से कैसे चलाएगा? क्या वो उन बैंकों पर सख्ती कर पाएगा जिनसे उन्होंने खुद कर्ज लिया है?
रिपोर्ट के मुताबिक जमात-ए-इस्लामी ने इसे ‘मॉब कल्चर’ की शुरुआत बताया है और कहा कि इस तरह सम्मानित हस्तियों को अपमानित करना अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर देगा। विशेषज्ञों का कहना है कि एक बिजनेसमैन को रेगुलेटर बनाना वैसा ही है जैसे बिल्ली को दूध की रखवाली सौंप देना। कुछ विपक्षी नेताओं ने तो यहां तक कह दिया कि सरकार ने देश के खजाने की ‘लूट’ का रास्ता साफ करने के लिए अपने चहेते कारोबारी को बैठाया है। अब बांग्लादेश में लोगों को लग रहा है कि अगर सेंट्रल बैंक की आजादी खत्म हुई और वहां राजनीति हावी हो गई, तो पहले से ही लड़खड़ाता हुआ बैंकिंग सिस्टम पूरी तरह ढह सकता है।

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