Phag Festival Malkapur Betul: मलकापुर में जीवित है सदियों पुरानी फाग की परंपरा, शिवरात्रि से रंग पंचमी तक गूंजते हैं लोकगीत
Phag Festival Malkapur Betul: बैतूल (राष्ट्रीय जनादेश)। त्योहारों से जुड़ी कई परंपराएं अब लुप्त होती जा रही है। हालांकि कुछ गांव अभी भी अपनी परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं। यही वजह है कि त्योहारों का उत्साह और उमंग वहां देखते ही बनता है और पूरे गांव का माहौल रोमांच से भर जाता है। समीपी ग्राम मलकापुर में भी कई परंपराएं आज भी जीवंत हैं। इन्हीं में से एक है फाग गायन। इस परंपरा को युवा वर्ग सहेजे हुए हैं और आगे बढ़ा रहे हैं।
इस साल भी मलकापुर में शिवरात्रि पर्व से ही फाग की महफिलें जमना शुरू हो चुका है। रोजाना यहां होली गावे बीन बजावे सखी... न जइयो नंद के लाला.... कोई आया शहर का व्यापारी.... जैसे हंसी ठिठोली वाले गीत फिजां में गूंजने लगते हैं। इन्हें सुनकर ऐसा लगता है मानो श्रृंगार रस की बारिश हो रही है। फाग के बोल सुनकर बच्चों से लेकर वृद्ध तक झूम उठते हैं।
पुरानी विरासत को युवा आगे बढ़ा रहे
फाग गीतों को कॉपियों में संजोकर रखने वाले ग्राम के लोकेश वर्मा बताते हैं कि फाग गाने की परंपरा को जीवित रखने वाले फाग के सबसे पुराने गायक गिरधारीलाल महतो के सानिध्य में वर्तमान में तीसरी पीढ़ी के युवा फाग के गायन में पारंगत हो चुके हैं। फाग गाते-गाते पूर्वजों की यादें भी ताजा हो जाती है। फाग गीतों में होली खेलने, प्रकृति की सुंदरता, राधा-कृष्ण, शिव पार्वती और सीताराम के प्रेम का वर्णन होता है।

ढोलक की थाप और मंजीरे की झंकार है लोक संस्कृति की पहचान.......
आधुनिकता की दौड़ में जहां युवा सोशल मीडिया और डिजिटल एंटरटेनमेंट में व्यस्त है वहीं गांव में इस परंपरा को जीवित रखने वाले मंडली के मुखिया गिरधारीलाल महतो बताते हैं कि फाग लोक संस्कृति है, जिसके माध्यम से अशिक्षित और अर्धशिक्षित हिंदू समाज के सदस्य भगवान शिव, श्री राम, श्री कृष्ण की आराधना करते थे। हंसी ठिठोली के बीच प्रेम का पर्व रंग गुलाल के साथ रंग पंचमी तक मनाया जाता हैं। पुराने समय में दिन भर खेतों में मेहनत मजदूरी कर शाम को जब किसान थक हार कर वापस आता था तब फाग की महफिलों की मस्ती उसकी पूरी थकान दूर कर तरोताजा कर देती थी।
शराब के सेवन पर था पूर्णत: प्रतिबंध
ग्राम के फाग प्रेमी लल्ला चौधरी बताते हैं कि पहले होली पर्व अलाव जलाकर उसके आसपास फाग गीतों को गाकर मनाया जाता था। उस समय शराब पर पूरी तरह प्रतिबंध था। भगवान की आराधना के साथ ही मनोरंजन के रूप में नाच गाकर त्यौहार मनाया करते थे। गीले-शिकवे दूर करने का माध्यम गुलाल लगाकर गले लगाना होता था। आज टीवी तथा मोबाइल ने विशुद्ध लोक संस्कृति को पीछे धकेल दिया। युवा वर्ग नशे में फिल्मी गाने और डीजे की धुन पर लोक संस्कृति को भूल कर मनोरंजन कर रहा है।
आगे भी जारी रहेगी यह परंपरा
मंडली के मुख्य युवा फाग गायक अखिल वर्मा, प्रेमकांत वर्मा, दीपक महतो बताते हैं कि अन्य गांवों में भले ही अब फाग के गीत नहीं गूंजते हो पर हमारे गांव में यह परंपरा जारी है और आगे भी रहेगी। मंडली में फाग को अपनी ढोलक की थाप पर निक्की महतो, श्रीकांत वर्मा, नीरज वर्मा, प्रीत वर्मा झुलाते हैं वहीं मनीष परिहार, विनय मालवी, अर्पित वर्मा, पुष्प मालवी, वंश चौधरी मंजीरों की झंकार से झूमने पर मजबूर कर देते हैं।
होली पर ऐसा रहता है गांव का माहौल
मलकापुर में होलिका दहन की रात गांव में आधी रात तक फाग का दौर चलता है। श्रृंगार, प्रेम, भक्ति और हास्य रस से भरी प्रस्तुतियां माहौल को रोमांचित कर देती हैं। धुरेड़ी के दिन सुबह से फगुआरों की टोली पूरे गांव में घूमकर गीत गाती है, रंग-गुलाल लगाती है और आपसी मेल-मिलाप का संदेश देती है। ग्राम के दिवंगत परिजनों के घर जाकर एक-एक फाग गीत सुनाना इस परंपरा की संवेदनशीलता और आत्मीयता को दर्शाता है।

पीएम मोदी ने असम रैली में कसा तंज, कहा- ‘शाही परिवार के नामदार हार का शतक लगाएंगे’
Ambati Rayudu ने CSK की डेथ बॉलिंग पर उठाए सवाल, कहा- ऐसा खेल स्वीकार नहीं
Madhya Pradesh में राज्यसभा चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज, BJP तीसरा उम्मीदवार उतार सकती है
हेमकुंड साहिब मार्ग पर बर्फ की सफेद चादर, टीम ने धाम तक पैदल निरीक्षण किया