Child Malnutrition in Betul: बैतूल (राष्ट्रीय जनादेश)। सरकार द्वारा कुपोषण का दाग मिटाने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही है, इसके बावजूद यह दाग नहीं मिट पा रहा है। इसका प्रमाण यह है कि आज भी जिले में 14466 बच्चे कुपोषित हैं। इतनी बड़ी संख्या में कुपोषित बच्चे पाए जाने से यह बात तो साफ हो जाती है कि अगले कुछ सालों में कुपोषण खत्म होने के कोई आसार नहीं हैं। इधर कुपोषित पाए जाने पर इन बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्रों (एनआरसी) में भिजवा कर इनका उपचार किया जा रहा है। 

केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा कुपोषण को समाप्त करने के लिए बीते कई सालों से एक नहीं बल्कि कई योजनाएं चलाई जा रही है। इन योजनाओं पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है। सरकारी अमले द्वारा इन योजनाओं का लाभ लोगों को देकर यह कोशिश भी की जा रही है कि कुपोषण समाप्त हो, लेकिन कई बार लोग भी अपनी ओर से लापरवाही या उदासीनता बरत लेते हैं, जिससे कुपोषण पूरी तरह से समाप्त नहीं हो पा रहा है। 

हर महीने चलाया जाता है अभियान 

योजनाओं के कारण कुपोषण में थोड़ी कमी जरुर आई है, लेकिन इसकी मौजूदगी पूरी तरह से समाप्त नहीं हुई है। कुपोषण की स्थिति जांचने के लिए महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा हर महीने आंगनवाड़ियों में अभियान चलाया जाता है। इसमें बच्चों की आयु के आधार पर वजन और लंबाई की स्थिति देखी जाती है। इसी के आधार पर यह तय होता है कि बच्चा कुपोषित है या नहीं और है तो किस श्रेणी में है। 

जनवरी में इतने बच्चे मिले कुपोषित

विभाग द्वारा जनवरी माह में भी यह अभियान चलाया गया। इस महीने कुल 14466 बच्चे कुपोषित पाए गए हैं। इनमें तीनों श्रेणियों के बच्चे शामिल हैं। इस महीने जिले भर की 2348 आंगनवाड़ियों में 1 लाख, 15 हजार, 864 बच्चे दर्ज थे। इनमें से 1 लाख, 15 हजार, 247 बच्चों का वजन लिया गया था। इन बच्चों में से 14466 बच्चे कुपोषित पाए गए हैं। 

किस श्रेणी में कितने बच्चे शामिल 

कुपोषण की सबसे खतरनाक स्थिति अति गंभीर कुपोषण की मानी जाती है। इसे सेम (सीवियर एक्युट मालन्यूट्रिशिन) कहा जाता है। इसमें बच्चे का वजन उसकी लंबाई या ऊंचाई के मुकाबले बहुत कम रहता है। इस श्रेणी में जिले में 1793 बच्चे पाए गए हैं।  इसे मध्य ऊपरी भुजा की परिधि नाप कर देखा जाता है। 

इसके बाद दूसरी स्थिति का कुपोषण मेम (मॉडरेट एक्युट मालन्यूट्रिशिन) होता है। इसमें तुरंत चिकित्सकीय आपात स्थिति तो नहीं रहती है, लेकिन ध्यान रखना आवश्यक होता है। इस श्रेणी में जिले में 8048 बच्चे पाए गए हैं। इसे भी मध्य ऊपरी भुजा की परिधि नाप कर देखा जाता है। इस श्रेणी में ठिंगने या बौने बच्चे आते हैं।  

तीसरी और आखरी स्थिति एसयूडब्ल्यू (सीवियरली अंडरवेट) की होती है। यह वजन आधारित स्थिति होती है। इसमें उम्र के मुकाबले वजन बहुत कम होता है। इस श्रेणी में जिले में 4628 बच्चे जनवरी माह में चिन्हित हुए हैं। 

कुपोषण दूर करने उठाए जा रहे यह कदम 

उल्लेखनीय है कि कुपोषण दूर करने के लिए आंगनवाड़ियों के माध्यम से 3 माह से 3 साल तक के बच्चों को टेक होम राशन दिया जाता है, 3 से 6 साल के बच्चों को आंगनवाड़ियों में भोजन दिया जाता है। इसके अलावा मंगल दिवस पर सभी बच्चों और गर्भवती व धात्री महिलाओं को भोजन दिया जाता है। अधिकारियों का कहना है कि सरकार और विभाग द्वारा तो पूरे प्रयास किए जाते हैं, लेकिन इसके बावजूद कम आयु में विवाह, गर्भावस्था में उचित पोषण व विशेष देखरेख नहीं किए जाने, बच्चों के जन्म के बाद भी उनके खानपान व पोषण पर ध्यान नहीं दिए जाने से कुपोषण की स्थिति निर्मित होती है।