Rural Employment Scheme: मनरेगा योजना से मजदूरों का मोहभंग, कम मजदूरी और लेट भुगतान बना बड़ी वजह
Rural Employment Scheme: बैतूल (राष्ट्रीय जनादेश)। केन्द्र सरकार द्वारा पिछले दिनों मनरेगा का नाम बदलकर विकसित भारत ग्यारंटी फार रोजगार एंड आजीविका मिशन ग्रामीण (जी रामजी) कर इसके प्रावधानों में बदलाव कर दिया है। पूर्व में प्रति मजदूर को मिलने वाले रोजगार सौ दिन प्रतिवर्ष को बढ़ाकर १२५ दिन प्रतिवर्ष कर दिया हैं, लेकिन मजदूरी दर कम होने और मार्केट में इससे लगभग दोगुनी मजदूरी मिलने के साथ ही समय पर मजदूरी भुगतान होने से मजदूरों का मनरेगा से मोहभंग हो गया है। हालात यह हो गए है कि काम पूरा करने के दबाव में कर्मचारियों द्वारा मशीनों से काम करवाकर फर्जी मजदूरों के मस्टररोल भरकर राशि निकाली जा रही है। काम के दिन बढ़ाने के बावजूद मनरेगा के लिए पर्याप्त मजदूर नहीं मिल पा रहे है।
ओपन मार्केट में मिल रही अधिक मजदूरी
पहले मनरेगा में मजदूरों को २६१ रूपए प्रतिदिन मजरी मिलती थी। सरकार द्वारा भले ही योजना का नाम और प्रावधान बदल दिए है, लेकिन मजदूरी यथावत रखी है। मनरेगा में भी मजदूरी दर २६१ रूपए ही है। जबकि आपेन मार्केट में मजदूरों को ४ सौ से ५ सौ रूपए और कृषि कार्यों में भी मजदूरों को ४०० रूपए मजदूरी दी जा रही है। इसके अतिरिक्त हम्माली करने वाले मजदूर प्रतिदिन एक हजार रूपए तक कमा रहे है। जिससे मजदूर मनरेगा में मजदूरी करने से कन्नी काट रहे है।
भुगतान लेट होने से भी नहीं आ रहे मजदूर
मनरेगा योजना के तहत पंचायतों में काम करने पर मजदूरी समय पर मिलने की भी ग्यारंटी नहीं रहती है। मजदूरों को दो-दो माह बाद तक मजदूरी नहीं मिलती है। मजदूर वर्ग परिवार चलाने के लिए मजदूरी करते है, उन्हें दैनिक या फिर साप्ताहिक मजदरी मिलने पर ही जरूरते राशन, किराना या अन्य सामनों की खरीदी करते है। पंचायतों के काम में समय पर मजदूरी मिलने की ग्यारंटी नहीं होती है। जबकि बाहर प्रायवेट काम करने पर मजदूरों को साप्ताहिक बाजार के दिन सप्ताह भर की मजदूरी नगद मिल जाती है। जिससे मजदूर जी रामजी में काम करने से कतराने लगे है।
मशीनों से करवा रहे काम
मनरेगा योजना के कार्यों के लिए मजदूर नहीं मिलने से कुछ स्थानों पर सरपंच-सचिव, रोजगार सहायकों द्वारा मशीनों का खुलेआम उपयोग किया जा रहा है। मजदूर नहीं मिलने से खुदाई के कार्यों में जेसीबी मशीन, मिट्टी मुरम परिवहन के लिए ट्रेक्टरों का तो सीमेंट रोड आदि निर्माण में बड़ी मिक्चर मशीनों का खुलेआम उपयोग किया जा रहा है। इसके द्वारा मजदूरी का रेशों पूरा करने फर्जी मस्टररोल भरकर अपने चहेते ग्रामीणों को मजदूरी करना दर्शाकर उनके नाम से राशि निकाली जा रही है। निर्माण एजेंसियों पर काम की प्रोग्रेस देने का दबाव रहता है जिससे वे खुलेआम मशीनों से काम करवा रहे है।
सामान भी नहीं दे रहे दुकानदार
मनरेगा योजना में काम करने के लिए रेता, गिट्टी, सीमेंट, लोहा सहित अन्य सामग्रियों की आवश्यकता होती है। दुकानदार को जैसे ही पता चलता है कि सामन मनरेगा योजना के कार्य के लिए ले जा रहे है वे सामन देने से मना कर देते है। जी रामजी में दिए गए सामान का भुगतान लंबे समय तक नहीं होने से दुकानदार सामान देने से स्पष्ट मना कर रहे है। एक पंचायत सचिव ने नाम न छापने की शर्त्त पर बताया कि मनरेगा के कार्यों के लिए वे सामान लेने जाते है तो दुकानदार भुगतान करने की समयसीमा पूछता है। दुकानदार १५ दिन से अधिकतम एक माह तक की उधारी पर सामन देने को तैयार है, लेकिन भुगतान एक माह तक भी नहीं होने से सामान देने से स्पष्ट मना कर देते है। मजबूरी में हम काम ही नहीं कर रहे है या फिर सामन लेने सरपंचों को आगे कर देते है। ऐसे में भुगतान लेट होने पर आए दिन होने वाले विवाद से बच रहे है।
