Public Hearing System Betul: बैतूल (राष्ट्रीय जनादेश)। आम लोगों की समस्याओं के निराकरण के लिए होने वाली जन सुनवाई का बैतूल में जो सिस्टम है वह पूरा प्रशासनिक कामकाज ठप कर रहा है। यहां कलेक्ट्रेट में होने वाली जनसुनवाई में हर विभाग के अफसर को शामिल होना पड़ता है। इनमें कई अफसर ऐसे होते हैं जिनके विभाग की शायद ही कभी कोई शिकायत आती हो, लेकिन फिर भी घंटों तक बैठे रहना पड़ता है। इस दौरान उनके विभागीय कार्य भी पूरी तरह से ठप पड़े रहते हैं। 

शासन की मंशा है कि लोगों की समस्या और शिकायतों का स्थानीय स्तर पर ही समाधान हो सके। इसके लिए ब्लॉक से लेकर जिला स्तर तक जन सुनवाई की व्यवस्था की गई है। नियम से तो मंगलवार को इन सभी स्तरों और हर विभाग में जन सुनवाई होना चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं है। ब्लॉक और तहसील स्तर के अफसर जन सुनवाई को गंभीरता से लेते ही नहीं। नतीजतन, पूरे जिले भर के लोग अपनी छोटी-छोटी समस्या भी लेकर कलेक्ट्रेट ही आते हैं। यही कारण है कि हर मंगलवार को कलेक्ट्रेट में लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता है। स्थिति यह है कि जन सुनवाई खत्म होने के बाद भी कलेक्टर चैंबर के सामने लोगों की कतार लगी रहती है। 

कलेक्ट्रेट में यह है व्यवस्था 

इधर कलेक्ट्रेट में होने वाली जिला स्तरीय जन सुनवाई में यह व्यवस्था है कि इसमें सभी विभागों के अधिकारियों को शामिल किया जाता है। सभी अधिकारियों को जन सुनवाई शुरू होने से लेकर आखिर तक मौजूद रहना होता है। इसके चलते उस दौरान वे विभाग का कोई भी काम नहीं कर पाते। विभाग के मुखिया के ही दफ्तर में हाजिर नहीं रहने से स्टाफ भी फिर मनमर्जी से काम करता है। 

हर विभाग में होनी चाहिए जन सुनवाई 

इसके विपरीत होना यह चाहिए कि हर विभाग में अलग-अलग जन सुनवाई होना चाहिए। इससे होगा यह कि लोग जिस विभाग की समस्या है, उस विभाग में पहुंच सके और उनकी समस्या का जल्द निराकरण हो सके। यदि लोग विभागों की समस्या लेकर कलेक्ट्रेट भी आ जाए तो वह समस्या उन विभागों को फारवर्ड करके एक निश्चित समय सीमा उनके निराकरण को दी जा सकती है। इनकी मॉनीटरिंग की व्यवस्था भी की जा सकती है। 

वैसे भी शिकायत ही दी जाती अफसरों को 

वैसे भी अफसरों के जन सुनवाई में मौजूद होने पर भी कौनसे अफसर तुरंत किसी समस्या का निराकरण कर देते हैं। वे आवेदन लेकर अपनी प्रक्रिया के अनुसार ही कार्यवाही करते हैं। इसलिए अफसरों को न बुलवाकर यदि उनके कार्यालयों में ही मौजूद रहने दिया जाए और आवेदन फारवर्ड करने की व्यवस्था की जाए तो वे अफसर उस दौरान अपने विभागीय कामकाज भी निपटा सकते हैं। यदि बहुत ही जरुरी हुआ तो संबंधित अफसर को तुरंत बुलाया भी जा सकता है। 

कई विभागों की समस्या ही नहीं आती

कुछ विभाग ही ऐसे हैं जिनकी सबसे ज्यादा शिकायतें जन सुनवाई में आती हैं- जैसे पुलिस, राजस्व, बिजली, पानी आदि। वहीं कई विभाग तो ऐसे हैं जिनकी कभी कोई शिकायत ही नहीं आती। इसके बावजूद चूंकि सिस्टम है तो उन विभागों के अफसरों को भी आकर घंटों तक बैठे रहना पड़ता है। ऐसे में उनका पूरा समय फालतू जाता है। वहीं कहने को भी हो जाता है कि वे जन सुनवाई में बैठे थे, इसलिए काम प्रभावित हुआ या नहीं हो पाया। इसलिए बेहतर होगा कि हर विभाग के अफसरों को जन सुनवाई में बुलवाने के बजाय उनके लिए केवल यह अनिवार्य कर दिया जाए कि वे मंगलवार को जिला मुख्यालय से बाहर हर्गिज न जाएं और दफ्तर में मौजूद रहे। इसके अलावा ब्लॉक और तहसील स्तर पर भी गंभीरता से जन सुनवाई शुरू कराने की दरकार है ताकि लोगों को बैतूल के चक्कर न काटने पड़े। 

सप्ताह में दो दिन तो बैठक में ही चले जाते

कलेक्ट्रेट में 2 दिन ऐसे होते हैं, जिनमें हर विभाग के अधिकारी को यहां आना और घंटों तक बैठना ही है। इनमें एक तो जन सुनवाई है और दूसरा हर सोमवार होने वाली टीएल की बैठक। इसके अलावा भी कई विभागों की समीक्षा बैठकें समय-समय चलती रहती है। टीएल और समीक्षा बैठकें तो ठीक है, लेकिन कम से कम जन सुनवाई की व्यवस्था बदल कर प्रशासनिक कामकाज की रफ्तार बढ़ाई जा सकती है। फिलहाल तो इन दो दिनों में सरकारी दफ्तरों का काम ठप जैसा ही रहता है। 

एसआईआर की सुनवाई के लिए घंटों इंतजार 

टीएल बैठक और जन सुनवाई से लोगों को कितना परेशान होना पड़ता है, इसका नजारा इन दो दिनों में तहसील कार्यालय में नजर आया। यहां अभी एसआईआर को लेकर सुनवाई चल रही है। इसमें जिन मतदाताओं के नाम सूची में नहीं आ सके, उनकी सुनवाई कर दस्तावेज जमा किए जा रहे हैं। यह कार्य तहसीलदार को करना है, लेकिन बैठक और जन सुनवाई के दौरान वे कार्यालय में मौजूद नहीं रह पाईं, जिससे आम लोगों को उनका घंटों तक इंतजार करने मजबूर होना पड़ा। व्यवस्था में बदलाव से लोगों को इस तरह परेशान नहीं होना पड़ेगा।