MNREGA ground reality: बैतूल (राष्ट्रीय जनादेश)। केंद्र सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना का नाम बदल दिया है। अब इस योजना का नाम विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन-ग्रामीण (वीबी-जी राम जी) कर दिया गया है। इसमें अन्य कई बदलावों के साथ एक प्रमुख बदलाव यह किया गया है कि एक परिवार को 100 दिन की जगह 125 दिनों के रोजगार की गारंटी दी गई है। दूसरी ओर योजना की जमीनी हकीकत कुछ और ही है। यहां हालत यह है कि ग्रामीण मनरेगा के तहत काम ही नहीं करना चाहते। जिससे पंचायतों में स्वीकृत काम पूरे कराना ही चुनौती बन जाता है। 

जिले में करीब साढ़े 3 लाख मजदूर मनरेगा के तहत पंजीकृत हैं, लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि वर्तमान में 14565 मजदूर ही कार्य कर रहे हैं। अधिकांश पंचायतों की हालत यह है कि उनके यहां जो काम स्वीकृत हैं, उन्हें करवाने के लिए उन्हें मजदूर ही नहीं मिलते। मनरेगा में काम करने के बजाय ग्रामीण उन कार्यों को ज्यादा तवज्जो देते हैं जहां पर मजदूरी तुरंत मिल जाती है। दूसरी ओर मनरेगा में 15 दिन से 30 दिन तक इंतजार करना पड़ता है। कई बार तो काफी लंबा इंतजार भी हो जाता है। 

इस साल दिन के अनुसार मजदूरी की स्थिति 

इस साल की स्थिति देखें तो खुद ही स्पष्ट हो जाता है कि ग्रामीणों की योजना के प्रति कितनी रूचि बची है। अभी तक 28009 परिवारों ने मात्र 1 से 14 दिन की मजदूरी की है। 15 से 30 दिन के बीच मजदूरी करने वाले परिवारों की संख्या 19824 है। 31 से 40 दिन मजदूरी करने वाले परिवारों की तादाद 7899 है तो 41 से 50 दिन के बीच वाले मजदूर परिवारों की संख्या 6682 है। 

सौ दिन वाले परिवार केवल 488 ही 

आंकड़ों से साफ है कि जैसे-जैसे दिन बढ़ रहे हैं वैसे-वैसे परिवारों की संख्या भी कम होती जा रही है। 51 से 60 दिनों वाले मजदूर परिवार 4930 है तो 61 से 70 दिन वाले परिवार और कम होकर 3538 रह गए हैं। इसी तरह 71 से 80 दिन मजदूरी वाले परिवार मात्र 3136 और 81 से 99 दिन वाले परिवार 9088 हैं। अब यदि 100 दिन की गारंटी के अनुसार 100 दिन मजदूरी करने वाले परिवारों की संख्या देखें तो जिले में इनकी संख्या मात्र 488 है। 

सौ दिन वाले सर्वाधिकार परिवार मुलताई के 

इस साल जिन परिवारों ने अभी तक 100 दिन की मजदूरी कर ली है उनके सबसे ज्यादा परिवार मुलताई के 240 हैं। इनके अलावा आमला के 28, आठनेर के 11, बैतूल के 16, भैंसदेही के 26, भीमपुर के 54, चिचोली के 14, घोड़ाडोंगरी के 47, प्रभातपट्टन के 35 और शाहपुर के 17 परिवार शामिल हैं।  

इन कारणों से नहीं रही ग्रामीणों की रूचि 

बताया जाता है कि मनरेगा योजना में पेमेंट के लिए काफी इंतजार करना होता है। दूसरी ओर प्राइवेट या खेतों में काम करने पर रोज या फिर हर सप्ताह भुगतान हो ही जाता है। इसके अलावा अधिकांश जगह मनरेगा की मजदूरी से अधिक पैसा मिल रहा है। इन्हीं कारणों से ग्रामीण मनरेगा की जगह प्राइवेट में या कृषि कार्य में मजदूरी करना पसंद करते हैं। जब कहीं काम नहीं हो, तब ही वे मनरेगा की ओर देखते हैं। यदि व्यवस्थाओं में आमूलचूल बदलाव नहीं किया गया और केवल नाम बदलने तक ही सीमित रहे तो नाम बदलने के बाद भी स्थिति जस की तस ही रहेगी। 

अभी तक इतनी राशि की गई खर्च 

मनरेगा के तहत अभी तक जिले में अकुशल मजदूरी पर 7226.16 लाख रुपये, अर्धकुशल और कुशल मजदूरी पर 45.44 लाख रुपये की राशि खर्च की गई है। इसके अलावा 1240.14 लाख रुपये सामग्री पर व्यय की गई है। शासन से अभी तक 1015.58 लाख रुपये की राशि मनरेगा योजना के लिए उपलब्ध कराई जा चुकी है।