Betul Bus Service: बैतूल (राष्ट्रीय जनादेश)। कोरोना महामारी ने कई क्षेत्रों में आमूलचूल बदलाव लाया है। यात्री परिवहन सिस्टम भी इसकी भारी चपेट में आया है। पहले लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए बसों और टैक्सियों पर ही निर्भर थे। लेकिन, कोरोना महामारी ने लोगों को आत्मनिर्भर बना दिया। अब लोग निजी वाहनों से अधिक सफर कर रहे हैं। इससे कई रूटों पर यात्रियों के टोटे के कारण बसों की संख्या में बेतहाशा कमी करना पड़ा है।

बेशक रेलगाड़ियां देश की धड़कन हैं, लेकिन इनसे सफर उन्हीं क्षेत्रों में किया जा सकता है जहां पर रेलवे का नेटवर्क है। दूसरी ओर आज भी देश का बड़ा हिस्सा ऐसा है जहां पर रेल नेटवर्क नहीं है। बैतूल जिले में भी अधिकांश हिस्से ऐसे हैं जहां पर रेल नेटवर्क नहीं है। ऐसे में इन क्षेत्रों में एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करने के लिए बसें और टैक्सियां ही सार्वजनिक परिवहन के प्रमुख साधन थे। इस बीच कोरोना महामारी आई और इस महामारी ने पूरा परिदृश्य ही बदल कर रख दिया है। 

कोरोना महामारी के दौर में जब रेल से लेकर बसें तक बंद थी, तब लोगों ने निजी वाहनों की अहमियत समझी और कई दूसरे काम एक तरफ रख कर अपनी क्षमता के अनुसार सबसे पहले वाहनों की खरीदी की। अधिकांश लोगों ने जहां मोटर साइकिलें खरीदी तो सक्षम लोगों ने कारें भी खरीदी। अब स्थिति यह है 50 से लेकर 100 किलोमीटर तक की दूरी तय करने के लिए लोग अपनी मोटर साइकिल का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे कई रूटों पर बसों को या तो बंद करना पड़ा या फिर उनकी संख्या में कमी करना पड़ा है। 

मजदूर भी आ रहे मोटर साइकिल से 

बैतूल से दीवानचारसी के बीच पहले 5 टाइम बसें चलती थी। इसकी वजह यह थी कि यहां से रोजाना बड़ी संख्या में ग्रामीण मजदूरी करने जिला मुख्यालय पर आते थे। इसके अलावा अन्य कार्यों से भी ग्रामीण आते थे। अब अधिकांश ने खुद की बाइक खरीद ली है। इसके अलावा 2-3 मजदूर शेयरिंग कर एक ही बाइक से आना-जाना कर लेते हैं। इससे कम खर्च में ही उनका काम हो जाता है। ऐसे में इस रूट पर अब सवारी ही नहीं मिलती। इसलिए अब मात्र एक बस चल रही है, वह भी ज्यादातर खाली। 

इन रूटों पर भी कम हो गई बसें 

इसी तरह बैतूल से सारणी के लिए पहले हर 20 मिनट में बस मिलती थी। अब वहां के लिए एक-एक घंटा बाद बसें चल रही हैं। इसी तरह बारव्हीं के लिए पहले 3 बसें चलती थीं, अब मात्र एक बस चलती है। मुलताई से बिरूल बाजार के लिए भी पहले 8 टाइम बसें चलती थी पर अब मात्र एक बस सुबह जाती है और शाम को वापस लौटती है। 

साईंखेड़ा के लिए एक भी बस नहीं 

पहले बैतूल से साईंखेड़ा के लिए भी 2 बसें चलती थीं। इनसे साईंखेड़ा और आसपास के गांवों के लोग सफर करते थे। अब स्थिति यह है कि वहां के लिए एक भी बस नहीं चल रही। इसी तरह खेड़ली बाजार, मोरखा, घाटबिरोली आदि रूटों पर भी पहले की तुलना में बसों की संख्या बेहद कम हो गई हैं। यदि कोई बस ऑपरेटर ज्यादा बसें चलाने की हिम्मत भी करता है तो उसका डीजल का खर्च तक नहीं निकल पाता। 

बड़े शहरों के लिए बसों की संख्या बढ़ी

इसके विपरीत इंदौर, नागपुर, भोपाल जैसे शहरों के लिए बसों की संख्या में खासा इजाफा हुआ है। ट्रेन की फिक्स टाइमिंग, कई-कई घंटों बाद ट्रेन का आना और उसमें भी आरक्षण नहीं मिलना जैसे कारणों से अब लोग बसों की यात्रा पसंद कर रहे हैं। एक ओर जहां लग्जरी बसें आ गई है वहीं थोड़ी-थोड़ी देर में बसों की आवाजाही हो रही है। साथ ही आसानी से सीट भी मिल जाती है। स्थिति यह है कि बैतूल से इंदौर के बीच ही 40 बसें चल रही हैं। 

जिले में इतनी बसों का संचालन 

जिले के प्रमुख बस व्यवसायी शरद वागद्रे बताते हैं कि बैतूल सहित मुलताई, भैंसदेही और सारणी से वर्तमान में करीब 125 बसों का संचालन हो रहा है। कोरोना काल के बाद अधिकांश लोगों ने बाइक या अन्य वाहन खरीद लिए हैं। अब 50-60 किलोमीटर तक का सफर लोग बाइक से ही कवर कर रहे हैं। ऐसे में कई रूटों पर यात्री ही नहीं मिल रहे हैं। जिससे ऑपरेटरों को उन रूटों पर बसों की संख्या कम करना पड़ा है। 

इन्हें उठाना पड़ रहा है परेशानियां 

इस पूरे परिदृश्य का एक दूसरा पहलू भी है। अधिकांश लोगों ने भले ही निजी वाहन खरीद लिए हैं, लेकिन आज भी कई लोग ऐसे हैं जो कि निजी वाहन नहीं खरीद पाए हैं। ऐसे में वे पूरी तरह से बसों पर ही निर्भर हैं। लेकिन, बसों की संख्या में बेतहाशा कमी होने के कारण इनकी परेशानी हो जाती है। जब उन्हें कहीं जाना हो तब उन्हें बस नहीं मिल पाती है। दूसरी ओर प्राइवेट वाहन करके जाने की उनकी स्थिति नहीं होती है। यही कारण है कि कुछ लोगों को लंबी दूरी पैदल ही तय करने को मजबूर होना पड़ता है।