बैतूल (राष्ट्रीय जनादेश) (Betul traffic system)। जिला मुख्यालय पर यातायात व्यवस्था किस कदर बेकाबू है, यह किसी को बताने की जरुरत नहीं है। नियमों को धता बताते हुए फर्राटे भरते वाहन, रोजाना जगह-जगह लगता जाम, व्यस्ततम मार्गों पर बेतरतीब खड़े वाहन शहर की यातायात व्यवस्था की बदरंग तस्वीर खुद ही दिखा देते हैं। इन सबके लिए लोग ट्रैफिक पुलिस को कोसते नहीं थकते हैं, लेकिन एक हकीकत यह भी है कि शहर की जरुरतों के अनुसार ट्रैफिक पुलिस के पास पर्याप्त बल ही मौजूद नहीं है। 

शहर की आबादी डेढ़ लाख से ऊपर है। आज स्थिति यह है कि हर घर में एक नहीं बल्कि एक से अधिक दो पहिया और अधिकांश घरों में कार तक मुहैया है। इसके अलावा जिला मुख्यालय और प्रमुख बाजार होने से पूरे जिले से प्रशासनिक, राजनीतिक कार्यों और खरीदी के लिए लोग जिला मुख्यालय आते हैं। ऐसे में रोजाना बड़ी संख्या में वाहन शहर की सड़कों पर दौड़ते नजर आ जाते हैं। गंज और कोठीबाजार के मुख्य बाजार में तो रोजाना जाम की स्थिति भी कई बार बनती है। इन हालातों में लोग सीधा ठीकरा ट्रैफिक पुलिस पर फोड़ देते हैं। दूसरी ओर खुद ट्रैफिक पुलिस कम अमला होने से स्वयं ही असहाय जैसी स्थिति में है। 

यातायात थाने में आधा भी बल नहीं 

बढ़ते वाहनों और ट्रैफिक के चलते जिला मुख्यालय पर वर्षों पहले अलग से यातायात थाना खोला गया है। उस समय की जरुरतों के अनुसार यातायात थाने में पुलिस बल भी स्वीकृत किया गया था। यह बात अलग है कि यातायात थाने को कभी भी स्वीकृत के अनुसार पूरा-पूरा अमला मिला ही नहीं। बदहाली का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यातायात थाने में 61 पद स्वीकृत है और पदस्थ महज 22 हैं। यहां वर्तमान में 45 पद रिक्त पड़े हैं। 

व्यवस्था संभालने वाले ही नहीं हैं 

यातायात व्यवस्था संभालने के लिए सबसे अहम कड़ी आरक्षक होते हैं। यहां आलम यह है कि थाने की हालत बिना आरक्षकों जैसी ही है। कहने को तो यहां आरक्षकों के 40 पद मंजूर हैं, लेकिन पदस्थ मात्र 7 ही हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि वास्तव में व्यवस्था संभालने वाले कितने कर्मचारी ट्रैफिक पुलिस के पास हैं। एक प्रधान आरक्षक के अंडर में कम से कम 4 आरक्षक तो होने चाहिए, लेकिन यहां तो 2 भी नहीं है। इस लिहाज से प्रधान आरक्षकों की स्थिति कुछ बेहतर है। प्रधान आरक्षकों के स्वीकृत पद 7 हैं और पदस्थ 5 हैं। हालांकि इनके भी 2 पद रिक्त हैं, लेकिन आरक्षकों जैसी बेहद बुरी स्थिति उनकी नहीं है। 

अधिकारियों के पद भी पड़े हैं खाली 

यातायात थाने में केवल कर्मचारियों के ही नहीं, बल्कि अधिकारियों के पद भी रिक्त पड़े हैं। थाना प्रभारी के लिए निरीक्षक का पद स्वीकृत है, लेकिन यातायात थाना को शायद ही कभी निरीक्षक प्रभारी मिला है। अधिकांश समय उप निरीक्षक या सूबेदार ही यातायात की कमान संभालते आए हैं। वर्तमान में भी थाना प्रभारी सूबेदार ही हैं। उप निरीक्षकों के 3 पद स्वीकृत हैं, लेकिन महज 1 पदस्थ हैं। इसके अलावा सहायक उप निरीक्षक के 8 पद स्वीकृत हैं, लेकिन मात्र 5 पदस्थ हैं। इनसे स्पष्ट है कि यातायात पुलिस के पास अफसरों से लेकर कर्मचारियों तक का खासा टोटा है। 

महिला आरक्षकों के अतिरिक्त पद 

एक ओर जहां थोक में पद रिक्त पड़े हैं वहीं राहत की बात यह है कि जरुरत को देखते हुए महिला आरक्षकों के पद स्वीकृत न होने के बावजूद यहां 2 महिला आरक्षक पदस्थ हैं। इसी तरह चालक का पद स्वीकृत नहीं होने के बावजूद चालक उपलब्ध है। हालांकि वास्तव में जिन पर मैदानी व्यवस्था संभालने और ट्रैफिक कंट्रोल करने का दारोमदार हैं, वे अधिकांश पद खाली पड़े हैं। 

बेलगाम व्यवस्था की एक वजह यह भी 

इसमें कोई शक नहीं कि बेलगाम यातायात व्यवस्था की मुख्य वजह अमले की कमी है, लेकिन एक हकीकत यह भी है कि यातायात पुलिस मुख्यालय से दिए लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अधिकांश समय व्यवस्था बनाने के बजाय चालानी कार्यवाही में जुटी रहती है। इसके अलावा कभी वीआईपी ड्यूटी तो कभी अन्य काम भी यातायात पुलिस को करने पड़ते हैं। इन्हीं सब कारणों से शहर की यातायात व्यवस्था कभी पटरी पर नहीं आ पाती है। 

इनका कहना...

यातायात थाने में स्वीकृत से काफी कम अमला है। पदों की पूर्ति के लिए समय-समय पर वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र लिखे जाते हैं। हालांकि जितने कर्मचारी हैं, उनसे ही ट्रैफिक को कंट्रोल करने का पूरा प्रयास किया जाता है। 
गजेंद्र केन
प्रभारी, यातायात थाना, बैतूल