Betul Government School Enrollment: बैतूल में सरकारी स्कूलों से उठ रहा भरोसा, कम हो रहे बच्चे, प्राइवेट में बढ़ रहे
बैतूल (राष्ट्रीय जनादेश) (Betul Government School Enrollment)। जिले के सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या घट रही है। वहीं निजी स्कूलों में स्थिति इसके उलट है। वहां पर दाखिला लेने वाले बच्चों की संख्या बढ़ रही है। यही नहीं 156 स्कूल जिले में ऐसे हैं जहां पर केवल 1 से 10 बच्चों का नामांकन ही हो सका है। दूसरी ओर ड्रॉपबॉक्स में जाने वाले बच्चों की संख्या भी 16898 है। इन सभी कारणों से जिले की रैकिंग अब 19 पर आ गई है।
बच्चों के नामांकन के मामले में जिले की स्थिति देखे तो जिला बीते साल के मुकाबले इस साल पिछड़ता नजर आ रहा है। यहां इस साल (सत्र 2025-26) स्कूलों में पिछले साल से कम बच्चों का नामांकन हुआ है। पिछले साल सत्र 2024-25 में जिले के सरकारी और निजी स्कूलों में 286579 बच्चों का नामांकन हुआ था। वहीं चालू सत्र 2025-26 में 282655 बच्चों का नामांकन ही हो पाया है। इस तरह 3902 नामांकन कम हो पाए हैं। यह कमी सरकारी स्कूलों के कारण हुई है। इसके अलावा ड्रॉपबॉक्स में पहुंचने वाले बच्चों की संख्या 16898 है। अच्छी बात यह है कि शून्य नामांकन वाला जिले में एक भी स्कूल नहीं है, लेकिन ऐसे स्कूलों की संख्या 156 हैं, जहां पर महज 1 से 10 बच्चों के ही नामांकन हो सके हैं। बच्चों के कम नामांकन के ही कारण जिले की प्रदेश में रैकिंग 19 पर आ गई है।
सरकारी स्कूलों में यह स्थिति
जिले के सरकारी स्कूलों में यदि नामांकन की स्थिति देखें तो इनमें 5566 नामांकन कम हुए हैं। पिछले सत्र में सरकारी स्कूलों में 190385 नामांकन हुए थे। वहीं दूसरी ओर इस साल 184879 बच्चों के नामांकन ही हुए हैं। सरकारी स्कूलों में ड्रॉपबॉक्स में जाने वाले बच्चों की संख्या 13149 हैं। वहीं 1 से 10 बच्चों के नामांकन वाले स्कूलों की संख्या 151 हैं।
निजी स्कूलों में बेहतर है स्थिति
सरकारी स्कूलों के मुकाबले निजी स्कूलों की स्थिति बेहतर है। निजी स्कूलों में नामांकन कम होने की जगह बढ़े हैं। पिछले साल निजी स्कूलों में 96194 बच्चों के नामांकन हुए थे। वहीं इस साल इनकी संख्या 97776 हो गई है। यहां बीते साल के मुकाबले 1582 नामांकन अधिक हुए हैं। निजी स्कूलों में ड्रॉपबॉक्स में जाने वाले बच्चों की संख्या भी कम 3749 है। ड्रॉपबॉक्स में उन बच्चों को शामिल किया जाता है, जिन्होंने पढ़ाई छोड़ दी या उस स्कूल से तो उनका नाम हट गया जहां पढ़ रहे थे, लेकिन किसी और स्कूल में नाम दर्ज नहीं हुआ है।
इन कारणों से घट रहे सरकारी स्कूलों में बच्चे
जानकारों का कहना है कि सरकारी स्कूलों में एक तो शिक्षक पर्याप्त नहीं है, कई स्कूलों में एक शिक्षक को 5-5 कक्षाएं संभालना पड़ रहा है। इससे पढ़ाई के स्तर का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। इसके अलावा कई स्कूल भवन जर्जर हैं, उनमें बच्चों के लिए ज्यादा सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। दूसरी ओर निजी स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक होते हैं और पढ़ाई का स्तर भी बेहतर होता है। इसके अलावा चमक-दमक के साथ बच्चों के लिए कई आकर्षक सुविधाएं भी उपलब्ध होती हैं। इन्हीं कारणों से अब पालक सरकारी स्कूलों की बजाय निजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना बेहतर समझते हैं। ग्रामीण क्षेत्र तक में लोग स्थानीय सरकारी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने के बजाय शहर के निजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाते हैं।
नामांकन बढ़ाने किए जाते हैं सभी प्रयास
इस संबंध में शिक्षा विभाग के योजना अधिकारी सुबोध शर्मा कहते हैं कि जन्म दर धीरे-धीरे कम हो रही है। यही कारण है कि जितने बच्चे कक्षा 12 वीं से निकलते हैं उतने बच्चों का कक्षा पहली में दाखिला नहीं हो पाता है। हालांकि अधिक से अधिक नामांकन करवाने पूरे प्रयास किए जाते हैं। सर्वे भी कराया जाता है ताकि स्कूल न जाने वाले बच्चों की संख्या सामने आ सके। कई बार पालक मजदूरी करने बाहर जाते हैं और बच्चों को भी साथ ले जा लेते हैं।

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