Betul Family Court: न्यायाधीश के धार्मिक उदाहरण से बेटे का बदला दिल, मां को भरण-पोषण राशि देने पर हुआ तैयार
बैतूल (राष्ट्रीय जनादेश) (Betul Family Court)। न्यायालयों में कभी-कभी प्रकरणों का निर्णय करने के लिए कानून की किताबों से हटकर भी संदर्भ और उदाहरण देने होते हैं। यदि सही संदर्भ और उदाहरण दिए जाए तो पेचीदे से पेचीदे मामले भी चुटकियों में और सकारात्मक रूप से सुलझ जाते हैं। बैतूल के कुटुंब न्यायालय में भी न्यायाधीश ने एक मामले को सुलझाने ऐसे ही धार्मिक संदर्भ और उदाहरण पेश किए। इसका नतीजा भी उसी सकारात्मक रूप में सामने आया, जैसी अपेक्षा की जा रही थी।
दरअसल, कुटुंब न्यायालय बैतूल में एक मां ने अपने बेटे के विरूद्ध भरण-पोषण राशि प्राप्त करने हेतु आवेदन प्रस्तुत किया था। इस मामले में बेटे का कहना था कि वह मां को अपने साथ रखकर उसका भरण-पोषण करने को तैयार है। इसलिए वह पृथक से भरण-पोषण नहीं दे सकता। इस पर मां का पक्ष था कि उसकी बहू उससे अच्छा व्यवहार नहीं करती, इस कारण वह बेटे के साथ नहीं रह सकती।
मध्यस्थता कार्यवाही में समझाइश
इन हालातों में यह मामला और लंबा खींचता या उलझता, उससे पहले ही इस पारिवारिक मामले में हुई मध्यस्थता कार्यवाही के दौरान समझाइश में सुलझ गया। कुटुम्ब न्यायालय के न्यायाधीश शिवबालक साहू ने इस मामले में धार्मिक संदर्भों के सहारे ऐसी समझाइश दी कि दोनों ही पक्ष संतुष्ट हो गए।
दिए गए यह धार्मिक उदाहरण
न्यायाधीश श्री साहू ने बेटे को समझाया कि संतान के लिए माता-पिता देवता के समान हैं। बेटे को यह भी कहा कि तुम पूजा करने मंदिर में जाते हो और मंदिर में पहले से ही मूर्ति के समक्ष अन्य भक्तों द्वारा बहुत सा चढ़ावा चढ़ा दिया जाता है। उसके बाद भी तुम अपनी श्रद्धा के अनुसार अपना चढ़ावा भी चढ़ा देते हो।
घर लाकर पूजने की नहीं करते जिद
उस समय आप यह तो नहीं सोचते कि मैं मंदिर में जाकर चढ़ावा क्यों चढ़ाऊं। भगवान की मूर्ति अपने घर पर लाकर पूजा करने की भी जिद नहीं करते, क्योंकि तुम सोचते हो कि मेरे चढ़ावे से मुझे पुण्य प्राप्त होगा। इसी तरह माता-पिता भी जिस स्थान पर रहते हैं, वह स्थान पुत्र के लिए मंदिर हो जाता है और वहीं पर पूजा करने से पुण्य प्राप्त हो जाता है। यदि आप अपने माता-पिता की सेवा करोगे, तो आपकी संतान आपकी सेवा करेगी। आप अपने माता-पिता को कष्ट दोगे, तो आपकी औलाद आपको कष्ट देगी।
राशि देने के लिए मान गया बेटा
उक्त समझाइश के आधार पर बेटे ने अपनी मां को प्रतिमाह 8000 रुपये अपने बैंक खाते के माध्यम से स्थानांतरित करने की सहमति दी। जिस पर मां ने भी अपनी स्वीकृति दी और आपसी समझाइश के आधार पर उक्त मामले का सद्भावना पूर्वक निपटारा हो गया। इसके बाद दोनों ही पक्ष प्रसन्नता पूर्वक न्यायालय से गए।

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