मयूर भार्गव, बैतूल (राष्ट्रीय जनादेश) (MP Political News)। वर्ष 2009 से 2019 तक लगातार बैतूल-हरदा-हरसूद संसदीय क्षेत्र की सांसद रही ज्योति धुर्वे की एक बार फिर भाजपा की सक्रिय राजनीति में वापसी की चर्चा चल पड़ी है। चर्चा के पीछे बड़ा आधार गत दिवस सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस द्वारा दिए गए एक फैसला है। ज्योति धुर्वे का 10 साल का संसदीय कार्यकाल फर्जी जाति प्रमाण पत्र के विवाद से जुड़ा रहा है।

अंतत: तमाम स्तरों पर हुई जांच में उनका जाति प्रमाण पत्र गलत पाया और इसके चलते 2019 में उनकी टिकट कट गई। उनके स्थान पर भाजपा ने डीडी उइके को प्रत्याशी बनाया और 2019 से लगातार अभी तक डीडी उइके बैतूल-हरदा-हरसूद संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व तो कर रहे हैं साथ ही नरेंद्र मोदी की सरकार में केंद्रीय राज्यमंत्री भी हैं। आने वाले समय में  2028 में विधानसभा और 2029 में लोकसभा के चुनाव होने हैं जिसके पहले देश में नया परिसीमन भी लागू हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस श्री सूर्यकांत के एक फैसले ने ज्योति धुर्वे की भाजपा की सक्रिय राजनीति में वापसी की उम्मीदों को बढ़ा दिया है। 

ज्योति धुर्वे लगातार 10 साल सांसद रही। भले ही उनके कार्यकाल में संसदीय क्षेत्र के लिए कोई विशेष उपलब्धि नहीं मिली लेकिन दोनों चुनावों में वे रिकार्ड मतों से जीती। 2009 में पहली बार लोकसभा का टिकट मिलने की घोषणा के पहले से ही उनके जाति प्रमाण पत्र को लेकर विवाद शुरू हो गए थे। बावजूद इसके उन्होंने 2009 से 2019 तक का संसदीय कार्यकाल पूरा किया। उनका जाति प्रमाण पत्र गलत सिद्ध हुआ और उन्हें 2019 में पार्टी ने लोकसभा की टिकट से भी वंचित कर दिया। इसके बाद से ज्योति धुर्वे यदा-कदा भाजपा के मंचों पर नजर आती थी और भाजपा की सक्रिय राजनीति से नेपथ्य में चली गई थीं। 

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश श्री सूर्यकांत ने पद संभालने के बाद जाति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला दिया जिसमें फरियादी को उसकी माँ की जाति के आधार पर अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र जारी करने की मंजूरी दी गई। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से एक नई बहस छिड़ गई है। चीफ जस्टिस श्री सूर्यकांत ने इस फैसले को देते समय कहा था कि माँ की जाति के आधार पर जाति प्रमाण पत्र क्यों नहीं दिया जा सकता है? बदलते समय के साथ माता की जाति के आधार पर क्यों जाति प्रमाण पत्र जारी नहीं किया जाना चाहिए?

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के इस जाति से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले के बाद ज्योति धुर्वे के मामले में भी राजनैतिक गाड़ी आगे बढऩे की संभावनाएं दिख रही हैं क्योंकि ज्योति धुर्वे की माँ भी अनुसूचित जनजाति से थी। यदि 2028 के पहले देश में परिसीमन लागू होता है जिसकी पूरी संभावना है तो माना जा रहा है कि बैतूल संसदीय सीट सामान्य या महिला के लिए आरक्षित हो सकती है। इसके बाद भैंसदेही और घोड़ाडोंगरी दो विधानसभाएं आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित हैं यदि लोकसभा सामान्य होती है तो डीडी उइके घोड़ाडोंगरी से और ज्योति धुर्वे भैंसदेही विधानसभा से भाजपा की प्रत्याशी बनाई जा सकती हैं। 

बहरहाल सुप्रीम कोर्ट के जाति संबंधी इस फैसले को लेकर ज्योति धुर्वे के शुभ चिंतक यदि श्रीमती धुर्वे के मामले में कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं और ईमानदारी से मेहनत करते हैं तो शायद उन्हें भी जाति संबंधी इस फैसले का लाभ मिल सकता है और ज्योति धुर्वे को अपनी माँ की जाति के आधार पर जाति प्रमाण पत्र मिल सकता है। हालांकि न्यायालीन प्रक्रिया में क्या निर्णय होंगे उनका अनुमान नहीं लगाया जा सकता लेकिन चीफ जस्टिस श्री सूर्यकांत और जस्टिस जॉय माल्या बागची की पीठ के निर्णय ने जाति प्रमाण पत्र को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।