संजय शुक्ला (अंदर की बात) (Police Humanitarian Act)। बेटी मेरी हो या फिर आपकी, अन्यथा और किसी की भी क्यों ना हो... बेटी तो बेटी होती है। एक बेटी में पिता का हर वह अरमान छिपा होता है जो वह मुंह से नहीं कहता है, लेकिन बेटी के लिए हर कदम पर मरने और मिटने को तैयार रहता है। 

कल्पना कीजिए कि मासूम बेटी को उठाकर हत्या का आरोपी ले गया था। एक-एक क्षण, एक-एक पल उसके माता-पिता पर कैसे बीत रहे होंगे? उनके मन और मस्तिष्क में कौन-कौन सी आशंकाओं से भरे सवाल कौंध रहे होंगे। करीब-करीब 30 घंटे के दौरान ना जाने वह कितने बार सोच-सोच कर ही मरे होंगे कि आरोपी उनकी नन्हीं सी बिटिया के साथ ना जाने क्या-क्या करेगा या कर दिया होगा? मन में तो यह भी प्रश्र कौंध रहा होगा कि कहीं अपहरण करने वाले पापी ने बेटी को मौत के घाट तो नहीं उतार दिया होगा? 

यहां पर यह उल्लेख करना बेहद लाजमी है कि मासूम के माता-पिता की जो मनोदशा थी, ठीक इसी तरह की या ऐसी ही पुलिस की भी बनी हुई थी। बैतूल और महाराष्ट्र पुलिस पूरी शिद्दत के साथ मासूम को सकुशल तलाश करने का प्रयास कर रही थी और इस प्रयास में पुलिस सफल भी हुई लेकिन कैसे? तो चलिए आज इस पूरे घटनाक्रम पर बात करते हैं। 

जैसे ही बच्ची का अपहरण होने की खबर पुलिस को मिली तो पुलिस के आला अफसरों से लेकर सिपाही तक हर वह शख्स जो कि बनाई गई 14 पुलिस टीमों में शामिल था, ने एक तरह से अपना सुख-चैन यह समझकर त्याग दिया था कि जब तक बच्ची नहीं मिल जाए वह लगातार प्रयास करते रहेंगे। 

चूंकि हम पेशे से पत्रकार हैं तो अंदर की बात भी बाहर आ ही जाती है। इस बार जो बात बाहर आई है उसके अनुसार पुलिस के आला अधिकारी से लेकर सिपाही तक सभी यह मानकर चल रहे थे कि चाहे कुछ भी क्यों ना हो जाए, बच्ची को सकुशल दस्तयाब करना ही है। याने इस बार आदेश-निर्देश के साथ-साथ पुलिस ने इसे व्यक्तिगत मामला मान लिया था और पुलिस वालों के इमोशंस भी जुड़ गए थे। 

पुलिस लगातार सर्चिंंग पर सर्चिंग किए जा रही थी, लेकिन सफलता हाथ नहीं लग रही थी। इस दौरान क्या मजाल कि पुलिस टीम में शामिल किसी को भी थकान महसूस हुई हो। हर जवान का बस एकमात्र सपना था कि बच्ची की तलाश करना है, फिर उसके लिए कोई भी कीमत क्यों ना चुकानी पड़े। कहावत भी है कि जब किसी चीज को पाने के लिए ईमानदारी से प्रयास किए जाए तो पूरी कायनात आपकी मदद करती है। पुलिस के साथ भी यही हुआ, मेहनत सफल हुई और बच्ची सकुशल दस्तयाब कर ली गई। पुलिस के लिए यह मात्र एक अपहरण का प्रकरण नहीं था। पुलिस के लिए यह संवेदनाओं और मानवता से जुड़ा हुआ प्रकरण बन गया था। आरोपी अपराध को अंजाम देकर फरार हो जाते हैं या फिर गिरफ्तार कर लिए जाते हैं। यह पुलिस की रूटिन प्रक्रिया मानी जाती है, लेकिन इस बार वाकई में पुलिस ने ना सिर्फ एक मासूम बच्ची को दस्तयाब करने का सफल कार्य किया है बल्कि उस उम्मीद... उस सपने... को भी टूटने से बचा लिया है जो कि गरीब माता-पिता... समाज... परिवार ने देखे थे। 

निश्चित रूप से पुलिस ने जो कार्य किया है वह सिर्फ शबासी देने से खत्म होने तक सीमित नहीं है बल्कि पुलिस ने उस समाज... परिवार... को भी एक सख्त संदेश देने का कार्य किया है कि पुलिस जब अपनी वाली पर आती है तो निश्चित रूप से आरोपी चाहे आकाश में या फिर पाताल (भूमिगत) में ही क्यों ना हो, उसे तलाश कर गिरफ्त में ले लिया जाता है। बस उसके लिए पुलिस को लगना चाहिए कि यह कार्य करना है। 

हमने  यह भी देखा है कि अपराध की दुनिया में जिनके नामों के कभी चिराग जला करते थे आज वहां पर पानी देने वाला भी कोई नहीं है। मासूम बच्ची को सकुशल उसके माता-पिता को सौंपने वाली बैतूल और महाराष्ट्र दोनों पुलिस के आला अफसरों से लेकर टीम में शामिल सिपाही तक सभी बधाई के पात्र हैं क्योंकि इनके जिस्म पर पहनी गई खाकी के पीछे धड़क रहे दिल की आवाज ने उस मासूम को सकुशल उसके माता-पिता से मिलाया है। पूरी टीम को पुन: बधाई, जय हिन्द...!