Motivational Hindi News: शिक्षिका पर दृष्टिबाधित दुर्गा की नजर पड़ते ही उमड़ पड़ा गुरु-शिष्य का प्यार, बेटी की तरह डॉ. सीमा भदौरिया के गले लग गईं विश्व विजेता
हेमंत चंद्र बबलू दुबे, बैतूल (Motivational Hindi news)। सनातन संस्कृति में गुरु को भगवान का दर्जा दिया गया है। गुरु और शिष्य की परंपरा का निर्वहन करने के लिए त्यौहार भी मनाए जाते हैं। भले ही चकाचौंध की दुनिया में कुछ लोगों के लिए इसका असर कुछ कम हो गया हो, लेकिन अभी भी ऐसे शिष्यों की लंबी फेहरिस्त है जो कि अपने गुरु को ही सर्वोपरि मानते हुए उन्हें सार्वजनिक रूप से सम्मान देने में कतई नहीं हिचकते हैं।
ऐसा ही नजारा उस समय देखने को मिला जब विश्व विजेता दुर्गा येवले के सम्मान में शहरवासियों ने पलक पावड़े बिछाते हुए उन्हें खुली जीप में खड़ा कर एक तरह से चल समारोह निकाला था। बेहद भीड़-भाड़ वाले माहौल में दुर्गा की एक झलक पाने के लिए सडक़ किनारे दुर्गा येवले की शिक्षिका डॉ. सीमा भदौरिया भी खड़ी थी। लेकिन, कहते हैं कि गुरु के बिना इस दुनिया में कुछ भी हासिल नहीं होता है और गुरु का दिया कभी भुलाया भी नहीं जा सकता है। कुछ इसी सोच के साथ दुर्गा की नजर जब उनकी शिक्षिका डॉ. सीमा भदौरिया पर पड़ी तो वह खुली जीप से उतरकर सीधे श्रीमती भदौरिया के पास आशीर्वाद लेने की पहुंची तो दोनों ने एक-दूसरे को अपनी बांहों में इस तरह से भरकर प्यार, दुलार किया जैसे कोई माँ - बेटी करती है। वाकई में इस मार्मिक दृश्य का वर्णन करना मुश्किल है पर जो देखा है वही यहां पर बयां किया जा रहा है। धन्य है ऐसी शिक्षिका और उनकी शिष्य जिसने गुरु के सम्मान को इन ऊंचाइयों तक अपने दिल में संभालकर रखा है।
जीवन में कुछ पल ऐसे उपस्थित होते हैं जो भावुक कर देने वाले होते हैं, जो कुछ कहते नहीं है लेकिन आंखों में से बहते आंसुओं की अविरल धारा बिना कुछ कहे सब कुछ कह जाती है। ऐसा ही दृश्य बैतूल की धरती पर उस समय देखने को मिला जब विश्व विजेता बनकर पहली बार बैतूल की धरा को नमन करते हुए विश्व विजेता बेटी दुर्गा येवले खुली जीप से उतरकर मार्ग के किनारे खड़ी अपनी शिक्षिका श्रीमती सीमा भदौरिया से गले मिली। मानो ऐसा लगा कि एक बिछड़ गई बेटी अपनी मां से वर्षों बाद मिल रही हो। डॉ. सीमा भदौरिया की आंखों से आंसुओं की अविरल धारा निकल रही थी।
शिक्षिका श्रीमती सीमा भदौरिया ने अपनी दोनों बांहों में दुर्गा को ऐसे समेट लिया जैसे मानो श्रीमती सीमा भदौरिया को दुनिया की सारी खुशियां मिल गई हों। इस दौरान उनके मन में कुछ इसी तरह का चल रहा होगा कि कहने को तो मेरी बेटी को दृष्टि बाधित कहा जा रहा हो लेकिन वास्तव में मेरी दुर्गा के पास ही वह दृष्टि है जो मार्ग के किनारे खड़ी अपनी शिक्षिका श्रीमती सीमा भदौरिया को देख पाने में सक्षम और समर्थ होती हैं और अपनी शिक्षिका से लिपट जाती है क्योंकि उसके पास प्यार, स्नेह, मानवता, इंसानियत के भाव से भरी दृष्टि है।
दूसरी ओर लेखक के पास सिर्फ दृष्टि है जिस दृष्टि में यह सारी बातों का नितान्त अभाव है, जो दुर्गा की दृष्टि में समाया हुआ है। जब ही तो उसे मार्ग के किनारे खड़ी अपनी शिक्षिका दिखाई दे जाती है। भावुकता के ये गौरवशाली पल वास्तव में एक विश्व विजेता बनने की सारी कहानी स्वत: ही कह जाते हैं, इसे किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, यह अपने आप अनुभूति कराते हुए ये पल आज दिखाई दिए है। ये क्षण हमें शिष्य और गुरु के बीच के उस रिश्ते को अपने आप ही रेखांकित कर देते हैं जो दूसरी कहानियों को लिखने और बताने में हमें शब्दों की कहानी बनाने में लगते हैं। सम्पूर्ण स्वागत यात्रा में यह तस्वीर वह वंदनीय तस्वीर है जो भारत की संस्कृति- संस्कार को चित्रित कर रही हैं।
आज मेरी आँखें यह दृश्य देख वास्तव में भावुक हो उठी और महसूस हुआ कि मेरी बेटी दुर्गा केवल एक विश्व विजेता खिलाड़ी ही नहीं, भारत की संस्कृति- संस्कारों की अग्रदूत है, जिसकी दृष्टि में अपनी शिक्षिका के लिए इतना अगाध प्यार स्नेह बसा हुआ है। लगता है हम तथाकथित दृष्टि वालों को यह दृष्टि नहीं मिली है जो दृष्टि दुर्गा को मिली है, जिसके दर्शन दुर्गा ने अपनी शिक्षिका श्रीमती सीमा भदौरिया से मिलते हुए हमें कराए हैं। कई बार सोचता है समाज, सरकार का इन बेटे- बेटियों के प्रति इतना असंवेदनशील और रुखा व्यवहार क्यों होता है या रहता है? आज उन सभी महानुभावों का हृदय से आभारी हूं जिन्होंने मार्ग के किनारे खड़े होकर अपनी विश्व विजेता बेटी दुर्गा का आत्मीय भावपूर्ण स्वागत किया है।
(लेखक, पूर्व खिलाड़ी एवं सक्रिय समाजसेवी हैं)

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